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District Archaeological Museum Mandla

जिला पुरातत्व संग्रहालय, मण्डला

जिला पुरातत्व संग्रहालय नगर के मध्य अतिव्यस्त क्षेत्र में बस स्टैंड से 5 मिनट की पैदल दूरी (सिविल लाइन) में स्थित है। जिले में पुरातत्व संग्रहालय की नीवं पुरातत्व संघ के सदस्यों द्वारा वर्ष 1976 में रखी गई थी जिसे वर्ष 1976 में मध्यप्रदेश शासन द्वारा अधिग्रहित कर निरंतर विकसित किया गया है। संग्रहालय में 610 पुरावशेष संग्रहीत करके रखे गये है। जिनमें प्रतिमाओं के अतिरिक्त विविध प्रकार के जीवाश्म, कलचुरि नरेश विजयसिंह देव का ताम्रपत्र, हस्तलिखित ग्रंथ पिपरहवा (बिहार) से प्राप्त बौद्धकालीन चावल, आदिवासी संस्कृति के उपकरण, आभूषण, आयुध, धातु की प्रतिमाऐं, तलवारें इत्यादि विवधतापूर्ण रोचक संकलन है। यहां प्रदर्शित सामग्री 7वीं शती ई. से 19वीं शती ई. का प्रतिनिधित्व करती है। कलचुरि राजाओं के संरक्षण में बलुआ पत्थर से निर्मित शैव, वैष्णव एवं जैन मूर्तिया अत्यन्त आकर्षक हैं। रामनगर की कौमारी, निवास की विष्णु, धनौली से प्राप्त लक्ष्मीनारायण, मवई से प्राप्त गंधर्व तथा शहपुरा से प्राप्त तीर्थकर प्रतिमाऐं कला के अद्वितीय नमूने हैं। यहां के मूर्तिशिल्प पर आदिवासी संस्कृति का भी वृहद प्रभाव है। क्षेत्र में नागपूजा प्रचलित होने के कारण नाग प्रतिमाऐं यहां संग्रहीत है।

यहां प्रदर्शित प्रतिमाऐं शहपुरा, निवास, धनौली, बिंझौली, रामनगर, मवई, हृदय नगर, झूलपुर, सूखखार आदि स्थानों से संग्रहीत कर रखी गई है। यहां प्रतिमा निर्माण में बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट पत्थर, चूना पत्थर, का प्रयोग किया गया है। चूना एवं मुरम ज्यादा उचित माध्यम नहीं होने के कारण प्रतिमाऐं क्षरित हो गई हैं। जीवाश्म संग्रह की दृष्टि से यह प्रदेश का प्रथम संग्रहालय है। यहां पादप जीवाश्मों का विशाल संग्रह है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की 50वीं वर्षगांठ पर निर्मित एक दीर्घा, जिसमें जिले के स्वतंत्रता संग्राम के अभिलेख संकलित कर प्रदर्शित किये गये हैं जिसमे स्वतंत्रता संग्राम की रोचक जानकारी प्राप्त होती है।

संग्रहालय में संग्रहीत पुरावशेषः- प्राचीन सिक्के:-

संग्रहालय में 2300 प्राचीन सिक्के संग्रहित है जिनमें 10 मुगलकालीन चांदी के सिक्के एवं 6 नग हुविष्क के सिक्के हैं। अधिकांश सिक्के ताम्बे एवं मिश्रित धातुओं के है।

पाषाण प्रतिमाएं:-

संग्रहालय में 380 पाषाण प्रतिमाएं संग्रहीत की गई हैं जिनमें कलचुरिकालीन, गौंडकालीन, मराठाकालीन प्रतिमाऐं सम्मिलित है। प्रतिमाऐं बलुआ, चूना, मुरम एवं श्वेत पत्थरों से निर्मित है।






धातु प्रतिमाऐं:-

संग्रहालय में 7 धातु की प्रतिमाऐं संग्रहित है जो आकार में अत्यंत छोटी एवं कलात्मक है। जिसमें शिव परिवार साधक एवं देवी की प्रतिमा विशिष्ट है।







ताम्रपत्र:-

कलचुरि संवत 949 (1197 ई.) का यह ताम्रपत्र राजा विजयसिंह देव द्वारा भारीम नामक ग्राम पं. विद्याधर नामक ब्राह्मण को दान किये जाने का उल्लेख मिलता है। यह 34 से. मी. लम्बा एवं 27 से. मी. चौड़ा है यह शुद्ध ताम्बे से बना हुआ है। इसमें 24 सीधी पक्तियां उत्कीर्ण की गई है।






अस्त्र-शस्त्र:-

संग्रहालय में चार तलवारें संग्रहीत हैं जिनमें एक चांदी की म्यान वाली तलवार शेष 2 लोहे की म्यान वाली तलवार एवं 1 दोधारी तलवार है।







बोतल:-

1760 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा एसेंज के विक्रय के लिये तैयार की गई यह बोतल प्रदर्शित है। जिसमें गणेश जी की प्रतिमा उकेरी गई है।

टेराकोटा:- 8

मृण्मयी मूर्तियां संग्रहालय में प्रदर्शित है। जिसमें नर्मदा देवी, जानवर एवं कुछ खिलौने है।

मैडल:-

मण्डला के चैधरी परिवार को रानी विक्टोरिया द्वारा प्रदान किया गया राय बहादुर नामांकित मैडल संग्रहालय में प्रदर्शित है।

प्राचीन पात्र व आभूषण:-

आदिवासी शैली के प्राचीन पात्र एवं प्राचीन आभूषण प्रदर्शित किये गये हैं जिनमें कलचुरिकाल में पहने जाने वाले हाथों एवं पैरों के आभूषण जो मिश्रित धातु से निर्मित है विशेष आकर्षक है।

आदिवासी उपकरण पात्र:-

मण्डला संग्रहालय आदिवासी जीवन शैली की झलक भी प्रस्तुत करता है। यहां आदिवासियों द्वारा देवी पूजा में प्रयोग किये जाने वाले बाने, खड़ाऊ एवं भूतबाजा संग्रहीत एवं प्रदर्शित है। साथ ही अनाज नापने के प्राचीन आदिवासी शैली के पात्र प्रदर्शित है।

बौद्धकालीन जले हुए चावल:-

बोधगया बिहार से लाकर मण्डला संग्रहालय में बौद्धकालीन चावल प्रदर्शित है जो देषभर में प्राप्त अनाज के सर्वप्रथम प्राप्त नमूने है।

जीवाश्म:-

जीवाश्म के प्रदर्शन के कारण मण्डला संग्रहालय की vishiविशिष्ट पहचान है। यहाँ प्रदर्शित पादप जीवाश्म 11 फीट से लेकर 2 से.मी. तक है। वृक्षों के अतिरिक्त यहाँ नारियल शंख, द्विदलीय बीज, डायनासौर का अस्थिजीवाश्म, सरीसृप की दंतपक्ति एवं फलों के जीवाश्म प्रदर्शित है।






विशिष्ट प्रतिमाएं:- गंधर्व प्रतिमा:-

कलचुरिकला कला का प्रतिनिधित्व करने वाली यह प्रतिमा गेरुआ बलुआ पत्थर से निर्मित उड़ते हुए गंधर्व की है। 26x27x90 से.मी. से यह प्रतिमा आपाद्मस्तक अत्यलंकृत है। इसका काल लगभग 11वीं शती. ई. माना गया है एवं मण्डला जिले के अत्यंत दुर्गम स्थल मवई से प्राप्त हुई है। अत्यंत सुंदर मुस्कानयुक्त द्विभुजी गंधर्व अपने दोनों हाथों में मंजीरा लिये हुए शिल्पांकित किया गया है। अतिसुंदर केशसज्जा से निर्मित जूड़ा उभरी हुई मूंछे, कोमल दाढ़ी इसकी चारूता की उन्नायक है। अर्द्धनिमीलित नेत्र, तीखे नाकनक्ष अतिसुन्दर अलंकरण संपूर्ण रूप से प्रतिमा अत्यंत भव्य, सुंदर एवं कोमल है।




कौमारी:-

बलुआ पत्थर से निर्मित लगभग 10वीं शती. ई. की यह प्रतिमा रामनगर नामक स्थल से प्राप्त हुई है। शिल्प के आधार पर यह प्रतिमा भेड़ाघाट की चैसठ योगिनी प्रतिमाओं के समकक्ष है। यह प्रतिमा 114x80x30 से.मी. माप की है त्रिमुख, त्रिनेत्र, चतुर्भुजी, कौमारी अर्द्धपर्यकासन में अपने वाहन मयूर पर स्थित है। पादपीठ पर श्री कौमारी अंकित है देवी के दाहिने दोनों हाथ स्कंध से खण्डित है। देवी अत्यंत सुन्दर पांरपरिक आभूषण धारण किये हूए है एवं हाथ में कलश धारण किये है।





गणेश:-

काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित गणेश की विशाल प्रतिमा भी रामनगर से प्राप्त हुई है इसका माप 103x58x30 से. मी. है। ललितासन मुद्रा में चतुर्भुजी गणेश हाथों में श्रीफल, सर्प, अंकुश एवं मोदकपात्र धारण किये है। श्री गणेश मुकुट, हार, भुजबंद, सर्प, यज्ञोपवीत, पाजेब धारण किये है पादपीठ पर वाहन मूषक अंकित है। काल लगभग 17वीं शती ई. है।





सूर्य:-

लगभग 17वीं शती. ई. की यह प्रतिमा काले बसाल्ट पत्थर पर निर्मित गई है। रामनगर के विष्णु मंदिर से प्राप्त यह प्रतिमा 110x72x18 से. मी. की है। प्रतिमा में अलंकरण बहुत ज्यादा नहीं है। प्रभामंडल युक्त सूर्य दोनों हाथों में सनाल कमल लिये सप्ताष्वः रथ पर योग-मुद्रा में है। रथ पर सारथी अरूण प्रदर्शित है। कमल पर ब्रम्हा आसीन है।

लक्ष्मीनारायण:-

110x66x27 से. मी. की यह प्रतिमा स्लेटी बलुआ पत्थर से निर्मित है। प्रतिमा लगभग 12वीं शती ई. की एंव धनौली ग्राम से प्राप्त हुई है। इस प्रतिमा की विशेषता है कि इसमें विष्णु के दसों अवतारों का अंकन है एवं गरूड़ को मानव रूप में अंकित किया गया है। विष्णु एवं लक्ष्मी को आकर्षक मुद्रा एवं अलंकरणो के साथ गरूड़ पर आसीन चित्रित किया गया है। यह कल्चुरि कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।





तीर्थंकर:-

शांतिनाथ, पार्श्वनाथ एवं एक पहचान चिन्ह अंकित न होने के कारण तीर्थंकर नामक 3 विशाल प्रतिमाऐं शहपुरा से प्राप्त हुई है। 11वीं एवं 12वीं शती. की यह प्रतिमाऐं बलुआ पत्थर से निर्मित हैं एवं अपनी नक्काशी के कारण जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है।






कापर प्लेट:-

कल्चुरि नरेश विजयसिंह देव का यह ताम्रपत्र 1197 ई. का है। यह ताम्रपत्र 34 से.मी. लम्बा 27 से.मी. चैड़ा तथा इसका वजन 2 किलो 180 ग्राम है। इसमें राजा विजयसिंह देव द्वारा अपने पुत्र त्रलोक्यमल्ल के जातकर्म संस्कार पर माटीम नामक ग्राम पं. विद्यासागर शर्मा को दान में दिये जाने का उल्लेख है।
इसका दूसरा भाग प्राप्त न होने के कारण यह अभिलेख अपूर्ण है पर इतिहास बताने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।





जीवाश्म:-

जीवाश्म संग्रह की दृष्टि से यह प्रदेश का प्रथम संग्रहालय है, यहां पादप जीवाश्मो का विशाल संग्रह है जिसमें ताड़वृक्षों की प्रजातियां संग्रहीत है। डायनासौर का अस्थि जीवाश्म (जंधा का अंश) शंख जीवाश्म, द्विदलीय बीजों के जीवाश्म, नारियल का जीवाश्म सरीसृप की दंतपंक्तियों का जीवाश्म यहां प्रदर्शित है। पादप श्रेणी के जीवाश्मों में जामुन, नारीयल एंव अशोक वृक्ष के जीवाश्म के अतिरिक्त युकेलिप्टस के जीवाश्म भी यहां पाये जाते है जो मूलतः भारतीय वृक्ष नहीं है। ये सभी जीवाश्म 7 से 10 करोड़ वर्ष प्राचीन है। विद्वानों का विचार है कि यहां की भूमि पर कभी समुद्र लहराता था क्योंकि सागर के खारे जल के निकट उपजने वाले पौधों के अतिरिक्त यहां शंख के जीवाश्म बहुलता से प्राप्त होते है। ‘




समय - प्रातः10 से शाम 5 बजे तक
प्रवेश शुल्क
1- भारतीय दर्शक - रू. 5.00
2- विदेशी दर्शक - रू. 50.00
3- फोटोग्राफी - रू. 50.00
4- विडियों ग्राफी - रू. 200.00
नोटः-
1- 15 वर्ष तक की आयु के बच्चों एवं विकलांग के लिये प्रवेश निशुल्क रहेगा।
2- सोमवार राजपत्रित अवकाश के दिन संग्रहालय बंद रहेगा।