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District Archaeological Museum Rajgarh

जिला पुरातत्व संग्रहालय, राजगढ़

मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय संचालनालय द्वारा वर्ष 1975-76 में जिला पुरातत्व संग्रहालय, राजगढ़ की स्थापना की गई। इस संग्रहालय में जिले में बिखरी कलाकृतियों को एकत्रित कर प्रदर्शित किया गया है। संग्रह में अधिकांश पाषाण प्रतिमाऐं है, जो शैव, वैष्णव, शाक्त एवं जैन धर्म की है। उमा-महेश्वर, भैरव, सप्तमात्रकाऐं, चामुण्डा, तीर्थंकर, एवं गणपति के विविध स्वरूप है। इन प्रतिमाओं का संकलन कालीपीठ, सांरगपुर, अन्देलहेड़ा, कुरावर, करनवास, माचलपुर, परसुलिया, गिरोदहाट, सांका, पचोर, परोलिया, बिसोनिया आदि ग्रामों से किया गया है। इन प्रतिमाओं में परमार काल की प्रतिमाओं की अधिकता है, जो कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
संग्रहालय में प्रदर्शित प्रतिमाओं का कालक्रम के साथ शैव, वैष्णव, शाक्त, जैन धर्म के प्रतिमा विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। संग्रहालय में प्रदर्शित विषिष्ट प्रतिमाओं को कालक्रम से निम्न दीर्घाओं में प्रदर्शित किया गया है।

शैव प्रतिमाऐं-

सांका नरसिंहगढ़ जिला राजगढ़ से प्राप्त शिव का उर्द्धव भाग प्रतिमा का परिकर सहित आकर्षक वितान है। शिव के हाथों में त्रिशूल एंव नाग स्पष्ट है। आभूषण में मणिमाला, कानों में कुण्डल आदि का स्पष्ट अंकन है। उक्त प्रतिमा का आकार (35x22x10 c.m.) तथा बलुआ पत्थर पर उकेरी गयी है। इस प्रतिमा की तिथि लगभग 12वीं शती निर्धारित की जा सकती है।
उमा-महेश्वर की सव्य ललितासन में उमा को बायें जंघा पर आलिंगन मुद्रा में दिखाया गया है। पादपीठ पर वाहन नंदी एवं सिंह को प्रदर्शित किया गया है। नृत्यरत भृंगी, गणेश और कार्तिकेय के बीच में बने हुए है। ऊपर किरीट, मुकुट लेकर उड़ते हुए गंधर्वो का अंकन है। शिव जटामुकुट, कर्ण-कुण्डल, उरूबन्ध, यज्ञोपवीत, मेखला, पादजालक एवं वैजयंतीमाल के साथ दिखाये गये है। उमा का दायाँ हाथ शिव के कंधे पर तथा बायां हाथ जंघा पर है तथा अलंकरण में मुकुट, हारावली, वलय, मेखला, नूपुर का अंकन हैं आसन पर देवी के वाहन सिंह का अंकन है। यह प्रतिमा सांका ग्राम से प्राप्त हुई तथा लगभग 11वीं शती की है।

एक अन्य प्रतिमा कालीपीठ से मिली है। यह प्रतिमा ललितासन में उमा महेश्वर की शिल्पांकित की गई है। शिव के एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में बीजपूरक एवं तीसरे में सर्प है तथा चौथा हाथ उमा के उरोज के नीचे है। उमा का एक हाथ आलिंगन मुद्रा में तथा दूसरे में उन्होंने दर्पण धारण कर रखा है। उमा के सिर पर जटा मुकुट, कानों में कुण्डल, गले में हरावली, कटि मेखला, पादजालक एवं केयूर और वलय का अंकन है। प्रतिमा परमार काल का आकर्षक और प्रभावोत्पादक उदाहरण है। जिसकी तिथि 12वीं शती के आसपास निर्धारित कर सकते है। अन्य उमा-महेश्वर की प्रतिमाऐं पचोर, ब्यावरा, सांका गांवों में एकत्रित की गई है। सभी प्रतिमायें परमार काल का द्योतन करती है। अलंकरण की दृष्टि से इन्हें 11-12वीं शताब्दी के काल निर्धारण में रखा जा सकता है।

गणेषः-

इस संग्रहालय में गणेश की स्थानक, नृत्यरत, अर्द्धपर्यकासन प्रतिमाऐं विभिन्न क्षेत्रों से एकत्रित की गई है। गिरोदहाट से प्राप्त प्रतिमा नृत्यरत है। यह प्रतिमा दो स्तंभों के मध्य अष्टभुजी है। हाथों के आयुधों में परशु, नाग का अंकन तथा शेष आयुध खंडित है। एक अन्य दशभुजी गणेश प्रतिमा नृत्य मुद्रा में बनाई गई है। हाथों में परशु, मोदक, आयुध है तथा शेष आठ हाथ खंडित अवस्था में है। आभूषण में करण्ड मुकुट, वलय नूपुर, यज्ञोपवीत, केयूर दर्शाए गये हैं नीचे वाहन मूषक का आलेखन मनोहारी है। यह गणेश प्रतिमा बिसोनिया से लाई गई है, जो लाल बलुआ पत्थर पर उकेरी गई है। जिसकी तिथि लगभग 12वीं शती निर्धारित की जा सकती है। अर्धपर्यकासन में गणेश की प्रतिमा के हाथों में अंकुश, सर्प, पात्र का आलेखन है। आभूषणों में करण्ड मुकुट, हारावली, पादजालक का अंकन है। पादपीठ पर दाहिनी ओर वाहन मूषक अंकित है। अलंकरण सामान्य है।


कार्तिकेय एवं नंदी-

भगवान शिव के परिवार में कार्तिकेय प्रधान देवता माने गये है। आगम ग्रंर्थो में कार्तिकेय स्कंद के नाम से भी जाने जाते है। दक्षिण भारत में उन्हें सुब्रहाण्यम नाम दिया गया है। वृहदसंहिता में मोर एवं शक्ति कार्तिकेय के अंग माने गये है। इस संग्रहालय में कार्तिकेय की प्रतिमा प्रदर्शित है। इसमें शिखर युक्त आवाक्ष के नीचे स्तंभों के मध्य त्रिभंग मुद्रा में अंकित किया गया है। पार्श्व में लम्बे पंख सहित वाहन मयूर को दिखाया गया है। अलंकरण में केश राशि, कर्ण कुण्डल, हारावली, कटिमेखला आदि का मनोहारी अंकन है। अन्य प्रतिमा भी इस संग्रहालय में शिव के वाहन नंदी की स्वतंत्र मूर्तिया भी एकत्रित कर प्रदर्शित की गई है।

देवी प्रतिमाऐं-

इस संग्रहालय में गौरी, महिषासुरमर्दिनी, सरस्वती, चामुण्डा की प्रतिमा प्रदर्शित की गई है, जो परमार काल की है। गौरी की प्रतिमा, शैव सम्प्रदाय से संबंधित है, जो समभंग से प्रदर्शित किया गया है, प्रतिमा के भुजाओं में अक्षमाला, कमलासीन (गणेश), कमल पुष्प एवं कमण्डल दर्शाया गया है। अलंकरण में जटमुकुट, कुण्डल, हारावली, केयूर वलय, कटिमेखला एवं पाद जालक का अंकन है। एक अन्य प्रतिमा में चतुर्भुज गौरी क नीचे का भाग खण्डित है। जिसके परिकर में विद्याधरों का अंकन आकर्षक हैं। सम्पूर्ण अलंकरण परमार कालीन शिल्पकला के अनुरूप है।
महिषासुरमर्दिनी की दो प्रमुख प्रतिमाऐं संकलित है। दोनों प्रतिमाऐं अलग-अलग स्थान से प्राप्त हुई है। वास्वत में महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा संग्रहालय की विशिष्ट प्रतिमाओं की श्रेणी में आती है। एक प्रतिमा में देवी को राक्षस महिष का वध करते हुये दर्शाया गया है। चतुर्भुजी देवी के हाथों में दक्षिणाध क्रम में त्रिशूल, खड्ग, खेटक एवं असुर के केश पकड़े हुए है। देवी के मस्तक पर जटामुकुट, कान में चक्र कुण्डल, गले में सुन्दर हारावली, भुजाओं में केयूर एवं पैरों में पदजालक का अंकन है।

यह प्रतिमा परोलिया ग्राम से प्राप्त हुई है। दूसरी प्रतिमा में महिषमर्दिनी छः भुजाओं के साथ कलात्मक रूप से दर्षाया गया है। इसमें असुर का धड़ मस्तक से अलग बताया गया है। सरस्वती प्रतिमा कलात्मक रूप से परमार कालीन षिल्प की प्रतिमा कालीपीठ और गिरोदहाट जिला राजगढ़ से लाई गई है, दोनों प्रतिमाऐं सव्य ललितासन में प्रदर्शित की गई है। पुस्तक, कमण्डल, वीणा, अक्षमाला का हाथों के आयुध के रूप में प्रयोग किया गया है, वाहन हंस का भी सुंदर अंकन हे। अभिव्यक्ति मनोहारी और मुखमुद्रा सौम्य एंव शांत है। सप्तमातृकाओं में एक सप्तमातृका पट्ट इस संगहालय में प्रदर्शित है तथा इन देवियों में से चामुण्डा प्रतिमा काफी अच्छी हालत में है। चामुण्डा की नृत्य करती हुई प्रतिमा जिसमे आयुध एवं अलंकरण परमार काल की दृष्टि से बनाया गया है। पेट के बीच में बिच्छु का अंकन दर्शाया गया है। यह प्रतिमा गिरोदहाट ग्राम से प्राप्त हुई है।


वैष्णव प्रतिमाऐं-

विष्णु की स्वतंत्र प्रतिमाओं के साथ लक्ष्मी-नारायण, सूर्य-नारायण की प्रतिमा राजगढ़ संग्रहालय में मिलती है।
लक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा में उन्हें आलिंगन मुद्रा मे दर्शाया गया है। गदा और चक्र आयुध के रूप में तथा अलंकरण में मुकुट, हारावली, केयूर, वलय का अंकन है। यह प्रतिमा परोलिया से मिली है, जो लगभग 12वीं शती की प्रतिमा होती है।
सूर्य-नारायण का ऊपर का भाग ही प्राप्त हो सका है। सूर्य नारायण के दायीं भुजा में शंख एवं विकसित सनाल कमल पुष्प अंकित है। बांई भुजाऐं भग्न है। वक्ष स्थल का अंकन सुरूचिपूर्ण बना है। यह कालीपीठ से प्राप्त प्रतिमा है। राजगढ़ पुरातत्व संग्रहालय में करनवास एवं सांका से ब्रम्हा की परमार काल की प्रतिमा संग्रहित की गई है। ब्रम्हा को तीन मुख सहित दर्शय गया है। भुजाओं में दक्षिणाधक्रम में अक्षमाला, वेद, कमण्डल लिये समभंग में प्रदर्शित किया गया है।

राजगढ़ क्षेत्र में सांका ग्राम से प्राप्त सूर्य की प्रतिमा संग्रहालय की प्रमुख प्रतिमाओं में से एक है। इस प्रतिमा में सात घाड़ो से युक्त रथ पर आरूढ़ उदीच्य वेश धारण किये हुए सूर्य देवता को अत्यधिक कलात्मक ढंग से प्रदर्शित किया गया है। आसन पर दानो ओर दण्ड और पिंगल तथा उषा-प्रत्युषा का अंकन किया गया है। बगल में दो उपासिकाओं का अंकन किया गया है। अलंकरण की दृष्टि से सूर्य देवता के कर्ण कुण्डल, हारावली, वक्ष पर कवच, कटि मेखला तथा पैरो में उपानह आदि का कलापूर्ण चित्रण किया गया है। प्रतिमा निर्माण में संतुलन और सौम्यता है।

जैन प्रतिमाऐं-

चौबीस तीर्थंकरों की यक्ष यक्षिणियों सहित प्रतिमाऐं प्राचीन काल से मध्यकाल तक की मूर्तियां मिली हैं, जिन्हें संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। इनमें से दो जैन प्रतिमाऐं शिवपुरी से तथा शेष स्थानीय क्षेत्र से एकत्रित की गई है।
इस संग्रहालय में एक विशाल जैन तीर्थकर की प्रतिमा प्रदर्शित की गई है, जो कि कालीपीठ, जिला राजगढ़ से प्राप्त हुई है। जैन यक्षिणी अम्बिका कायोत्सर्ग मुद्रा में शिल्पांकित प्रतिमा के दाई ओर आम्रलुम्बी प्राप्त हुई है। बाई तरफ, युगल मकर आकृति का एंव गजस्थाल का सुंदर अंकन है। इनको अधिकतर गोमेद यक्ष के साथ दर्षाया जाता है, जो जैन कला के परमार काल का उत्कृष्ठ उदाहरण है।




सिक्के-

संग्रहालय में मुद्रा विज्ञान से जन सामान्य को परिचित कराने के उद्देश्य से संग्रहीत सिक्कों का प्रदर्शन शोकेस में किया गया है। सिक्के कालक्रम के अनुसार प्रदर्शित किये गये है। इनमें आहत मुद्राऐं, सिन्धिया, स्थानीय सिक्के, रियासती सिक्के भी प्रदर्शित किये गये है। इनमें प्रमुख ईस्ट इंडिया कम्पनी, ग्वालियर स्टेट, झाबुआ एवं रतलाम की मुद्राओं के अतिरिक्त बड़ौदा, देवास, इंदौर की ताम्र मुद्राऐं भी है। मुगलकालीन सिक्के, माण्डव सुल्तान एवं दिल्ली सुल्तान के सिक्कों से मध्यकालीन इतिहास की कड़ी को दर्शाया गया है।

संग्रहालय खुलने व बन्द होने का समय
संग्रहालय खुलने का समय प्रातः 10 बजे से सायः 5 बजे तक।
प्रत्येक सोमवार एवं शासकीय अवकाश के दिन संग्रहालय बन्द रहेगा।
प्रवेश शुल्क
भारतीय नागरिक रू. 5.00 प्रति व्यक्ति (15 वर्ष तक के बच्चे निशुल्क)
विदेशी नागरिक रू. 50.00 प्रति व्यक्ति
फोटोग्राफी शुल्क रू. 50.00 प्रति कैमरा
विडियोग्राफी शुल्क रू. 200.00 प्रति कैमरा
प्लास्टर कास्ट एवं प्रकाशन विक्रय केन्द्र पर विभागीय प्रकाशन की पुस्तकें, फोल्डर, पोस्ट कार्ड एवं प्लास्टर कास्ट प्रति कृतियां उपलब्ध हैं।