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Golghar, Bhopal

संग्रहालय खुलने का समय प्रातः 10 बजे से सायः 5 बजे तक।

प्रत्येक सोमवार एवं शासकीय अवकाश के दिन संग्रहालय बन्द रहेगा।

 
Gujri-Mahal-Museum

भोपाल शहर के शाहजहाँ नाबाद में परीपार्क के पास बने इस गोलाकार भवन गुलशन -ए-आलम को गोलघर के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण नवाब शाहजहाँ बेगम द्वारा 1868-1901 के शासन में हुआ था। यह गोलाकार भवन दो दर्जन दरवाजों से युक्त है। इसके गोल भाग में सीढ़ियां है जो ऊपर की ओर जाती हैं। ऊपरी कक्ष में गुम्बद है, स्तंभ गोल व दरवाजे अलंकृत हैं। गुम्बद में बैंगनी, पीला, नांरगी, लाल, भूरा व हरे रंगों के उपयोग से चित्रकारी की गई हैं। ऊपर की ओर गोलाकार बरामदा है, जो टीन की शीट से आच्छादित है जिन्हे लकड़ी के खंभो पर आधारित किया गया है। मूल रूप में इसमें पर्शियन शैली का बगीचा था, जिसे जन्नत बाग के नाम से जाना जाता था।

पहले इसमें शाहजहाँ बेगम का कार्यालय स्थापित रहा, फिर चिड़ियाघर के रूप में इसका उपयोग किया गया जिसमें विभिन्न पक्षियों का संग्रह हुआ करता था। कालांतर में गोलघर का उपयोग नवाब वंशजो ने अपने कार्यालय के रूप में किया। उसके बाद शासकीय रेलवे पुलिस ने अपने कार्यालय के रूप में उपयोग किया। भोपाल नवाब के समय के सामाजिक, सांस्कृतिक, परिदृष्य की झलक को गोलघर में प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है।

Gujri-Mahal-Museum

भोपाल शहर अपने तालाबों के लिए सारे मध्यप्रदेश में प्रसिद्ध है, लेकिन इसके साथ ही भोपाल शहर के पुराने हिस्से को गलियों का शहर भी कहा जा सकता है। पुराने भोपाल में अब भी गलीयों का जाल बिछा है। भोपाल की गलियों में एक गुलीयादाई की गली है, जिसमें भोपाल के प्रसिध्द वैद्य खुशीलाल वैद्य रहते थे, जिनके सुपुत्र डॉ. शंकर दयाल शर्मा बाद में भारत के राष्ट्रपति बने। इसी गली में बाबूलाल भारती जो कि म.प्र की पहली विधानसभा के सदस्य थे, व उनके भाई चमन लाल भारती जो मशहूर गज़ल गायक थे दोनो रहा करते थे। भोपाल शहर को इतवारा, सोमवारा, मंगलवारा, बुधवारा जैसे नामो से वर्गीकृत किया गया हैं। भोपाल की तहज़ीब में इस शहर के पटियों का योगदान बहुत अधिक है। पुराने भोपाल के लगभग सभी घरों में बाहर की ओर पटिये लगे रहते थे, जिन पर शाम होते ही दरियॅा, चान्दनियां गावतकिये लगा दिये जाते थे, तो कही पर बैत बाजी व चार बैतों की महफिलें लगा करती थी।

कहीं-कहीं लेखकों की जमात भी इन पटियों पर बैठ कर अपने-अपने विचारों को व्यक्त करा करती थी। इन्ही पटियों पर बैठने वाले कुछ मशहूर लोगो में डॉ. शंकर दयाल शर्मा, मौलाना सईफदुल्लाह खां, मौलाना तर्जी मशरिकी, ठाकुर लाल सिहं, बिहारी लाल, सुल्तान मोहम्मद खां, शाकीर अली खां, अखलाक मोहम्मद खां, नूर बाज़ खां, पड़ित शिव नारायण वैद्य, डॅा.हमीद कुरेशी, फज़ल अली सरूर, मथुरा बाबू, पंडित चतुर नारायण मालवीय जैसे मशहूर लोग थे। ये पटिये भोपाल की गंगा-जमुनी सभ्यता के प्रतीक थे। उपरोक्त वर्णित तथ्यों की झलक इस संग्रहालय प्राप्त होती है।

दस्तकारी

नवाब सुल्तानजहाँ बेगम के समय में औरतो को आगे बढ़ाने के लिए उन्हैं दस्तकारी का काम सिखाया जाने लगा था, जिसमें ज़रदोजी, आरी, कारचोब, ज़री, कशीदाकारी, व कामदानी के हुनर व दस्तकारी सिखाई गई। क्यों की भोपाल में पान -सुपारी खाने का रिवाज़ था, इसलिए उन्हैं रखे जाने के लिए छोटे -छोटे बटुए कई आकार-प्रकार में बनने लगे, जो समस्त भारत में भोपाली बटुओं के नाम से मशहूर है। ये दस्तकारी के काम में कालांतर में टी-कोज़़ी ओर कपड़ो में किये जाने लगे। इस प्रकार भोपाल में किया जाने वाला ज़री का काम सबसे प्रसिध्द है। इन कारीगरों की हौसला ओर रोज़गार बढ़ाने के लिये इनकी बनाई चीजो को उपहार के रूप में बेगमें लोगो को दिया करती थी। नवाब सिंकदर बेगम ने 1851 में मदरिसा विक्टोरिया के नाम से एक स्कूल बनवाया था, जिसमें लावारिस बच्चें, यतीम, गरीब बच्चें दस्तकारी का काम व कारपेट वर्क, क्रोशिया वर्क, जूतासाजी, रंगरेज, बुनाई के अलावा चटनियां, अचार, व मुरब्बे भी बनाना सिखाया जाता था।

इसके अलावा भोपाल में शिक्षा का प्रसार किये जाने के लिए नवाबों व बेगमों द्वारा स्कूल, कालेज खुलवाए गये, जिनमें से कुछ जैसे मदरिसा सुलेमानिया 1870 में नवाब सिंकदर बेगम ने बनवाया था। जिसमें फारसी उर्दू के साथ-साथ अंग्रेजी भी पढ़ाई जाती थी, व लड़के-लड़़कीयां साथ-साथ पढ़ते थे। मदरसा जाहंगीर व मदरसा सिदीक्की शाहजहाँ बेगम ने बनवाया था। शाहजहाँ बेगम द्वारा बनवाया गया मदरसा बिलकिसीयां, गरीब और यतीम बच्चों के लिए बनवाया गया था। विक्टोरियां स्कूल में दस्तकारी, सोने, चांदी की सिलाई, गोटा, थप्पा, पैचक, लैस, कलाबत्तु, कुन्दे के तार, कलावा, जरदौज़ी जैसे काम भी सिखाए जाते थे। इसके अलावा मदरसा सुल्तानियां, मदरसा जमालउद्दीन खां, प्रिस ऑफ़ वेल्स स्कुल, मदरसा सिद्दीकी व तिब्बियां कॉलेज बनवाऐं गये थे।

चारबैंत

भोपाल में चलने वाली भाषा उर्दू में मालवी ओर बुन्देली भाषा के मिलन से बनी हुई है। भोपाल में बोली जाने वाली उर्दू में हिन्दीं व लोक भाषा के शब्दों का चलन भी है। नवाब काल में लड़ाई के वक्त सिपाहियों की हिम्मत बढ़ाने के लिए शेर कहे जाते थे, जिन्हे चार बैत के नामे से जाना जाता था। चार बैत सबसे पहले अरब देशों में ढपली बजाकर गाए जाते थे। मुगल, अफगान, कुर्द, कर्गज, तुर्क व पठानों का हिन्दुस्तान आने के साथ-साथ चार बैत भी हिन्दुस्तान में आया। मुगल बादशाह बाबर के साथ डफ (ढ़पली) बजाकर यौध्दाओं की वीरता के किस्से सैनिको को गा-गाकर सुनाए जाते थे। भोपाल के अलावा उ.प्र के कुछ शहरों में जैसे रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा, व राजस्थान में टौक, जयपुर, जौधपुर, में भी चार बैत की परम्परा जारी हैं।

भोपाल में चार बैत की शुरूआत अब्दुल करीम रामपुरी ने की थी। भोपाल के चार बैत गाने वालो में हिलाल खां उस्ताद, बिलाल खां उस्ताद, मारतोल खां उस्ताद, पिस्तौल खां, अमान उल्ला खां, बाके उस्ताद, मियां जान उस्ताद, घिस्सु खां, कप्तान खां, असगर खां, हमीद उस्ताद खां आदि थे। चार बैत सरदार दोस्त मोहम्मद खां के समय से शुरू होकर अन्तिम नवाब हमीदउल्ला खां के समय तक लगातार चलती रही। चार बैत के हर बंद में चार मिसरे होते है और एक चार बैत में कम से कम चार बंद होते है।

भोपाल शहर में शायरी का प्रचलन बहुत अधिक रहा है। भोपाल के कुछ प्रमुख शायर मुल्ला रमूजी, बरकतुल्लाह, माशूक अली खां जोहर, असद भोपाली, ज्ञानचंद जैन, जांहनिसार अख्तर, इकबाल मजिद, जैसे अनेको मशहूर शायर हुए हैं।

शायरी, दस्तकारी, बागो, बावड़ियों के अलावा भोपाल में खेलो में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल हॉकी रहा है। इसके लिए औबेदुल्लाह हॉकी कप का आयोजन आज भी किया जाता है।

भोपाल नवाब शासको के समय में हुए सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, व अन्य बदलावो के क्रमिक विकास का झरोखा गोलधर में प्रदर्शित करने का प्रयास किया है।