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गूजरी महल संग्रहालय, ग्वालियर

गुजरी महल संग्रहालय ग्वालियर

गूजरी महल किले के पूर्वी रास्ते पर बादलगढ़ दरवाजे के समीप स्थित है। रेल्वे स्टेशन एवं बस स्टेण्ड से गूजरी महल संग्रहालय की दूरी लगभग 4 कि.मी. है। गूजरी महल जाने के लिये टैक्सी, टैम्पो एवं ऑटो की सुविधा उपलब्ध है।
गूजरी महल संग्रहालय राज्य शासन के पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय विभाग के प्रमुख संग्रहालयों में से एक है। सन् 1913 में ग्वालियर राज्य के तत्कालीन महाराजा माधव राव सिंधिया ने पुरातत्व विभाग का गठन कर स्व. श्री एम.बी. गर्दे को इसका निदेशक नियुक्त किया तथा ग्वालियर में एक संग्रहालय स्थापित करने का निर्णय सन् 1914 में लिया गया। सन् 1914-1920 ई. के मध्य रियासत के विभिन्न स्थलों से पुरासामग्री का संकलन किया गया और संग्रहालय की स्थापना के लिये गूजरी महल का चयन किया गया। सन् 1922 ई. में संग्रहालय का विधिवत उद्घाटन किया गया। स्थापना से आज तक संग्रहालय ने विकास के कई सोपान पार किये हैं। नवीन दीर्घाओं का निर्माण किया गया है।


गूजरी महलः

संग्रहालय के लिये चुना गया गूजरी महल अपने आप में ही एक दर्शनीय स्मारक है। स्थापत्य एवं अलंकरण की दृष्टि से यह महल ग्वालियर के किले का दूसरा महत्वपूर्ण महल है।
गूजरी महल का निर्माण राजा मानसिंह ने अपनी सर्वाधिक प्रिय रानी मृगनयनी के रहने के लिये कराया था मृगनयनी गूजर वंश में पैदा हुई थी इसलिये इस महल का नाम गूजरी महल पड़ गया। राई गांव में रहने वाली गूजर कन्या निन्नी के नयन मृग के समान अत्यन्त सुंदर थे इसलिये राजा ने उसे मृगनयनी का संबोधन दिय
संग्रहालय में संग्रहीत बहुमूल्य पुरातात्विक धरोहर में पाषाण मूर्तियां, मृण्मूर्तियां, शिलालेख, ताम्रपत्र लेख, सिक्के, कांस्य मूर्तियां, रंग चित्र, अस्त्र-शस्त्र एवं उत्खनित पुरासामग्री शामिल हैं।

मूर्ति शिल्पः

प्राचीन भारतीय मूर्तिकला के अध्ययन की दृष्टि से गूजरी महल संग्रहालय एक आदर्श संग्रहालय है, इस संग्रहालय में मूर्तियों का विपुल भंडार है। इनमें मौर्य, शुंग, गुप्त, प्रतिहार, कच्छपघात, परमार मूर्ति शिल्प के श्रेष्ठतम उदाहरण सम्मिलित हैं। संग्रहालय की उल्लेखनीय मूर्तियों में यक्षमणिभद्र (प्रथम शती ईस्वी), यक्षिणी की मूर्ति (ईसा पूर्व 2री शती), महिषासुरमर्दिनी (5वीं शती), नृत्य एवं संगीत का दृष्य युक्त फलक (गुप्त कालीन) (5वीं शती), नागराज (5वी शती), योगिनी (7वीं शती), विष्णु विश्वरूप एवं उनके अवतार (10वीं शती) आदि की गणना की जा सकती है। ग्यारसपुर से प्राप्त शालभंजिका की मूर्ति इस संग्रहालय की सर्वश्रेष्ठ मूर्ति है। इनके अतिरिक्त विदिशा से प्राप्त सिंह शीर्ष, ताड़पत्र तथा भरहुत से प्राप्त वेदिका के अवशेष भी इस संग्रहालय की अमूल्य निधि है।




मृण्मूर्तियां--

संग्रहालय में पवाया से प्राप्त मृण्मूर्तियों का अच्छा संग्रह है। ये मृण्मूर्तियां तीसरी-चैथी शती ई. की हैं। इनमें राम सीता, अष्वमेध का घोड़ा, बुद्ध, स्त्री एवं पुरूष मस्तक आदि की मृण्मूर्तियां अद्वितीय हैं। इन मृण्मूर्तियों में शरीर सौष्ठव एवं केश विन्यास देखते ही बनता है।






शिलालेख एवं ताम्रपत्रः

संग्रहालय में 70 शिलालेखों, ताम्रपत्रलेखों का दुर्लभ संग्रह है। ये शिलालेख ब्राह्मी, देवनागरी तथा फारसी लिपियों में हैं। इन शिलालेखों के अध्ययन से तत्कालीन इतिहास एवं घटनाओं की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।






सिक्केः-

संग्रहालय में सिक्के भी पर्याप्त मात्रा में संग्रहीत हैं। ये सिक्के ईसा पूर्व तीसरी शती से लेकर 20वीं शती ई. तक के हैं तथा सोने, चांदी, तांबे एवं मिश्र धातु से निर्मित हैं। संग्रहालय के प्रमुख सिक्कों में आहत सिक्के, गुप्तवंश, नागवंश, मुस्लिम, मुगल एवं सिंधिया राजवंश के सिक्के विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

कांस्य प्रतिमाएं--

संग्रहालय में कांस्य प्रतिमाओं का संग्रह भी है। इनमें पंचमुखी गणेश, ताण्डव करते हुए शिव, शेषशायी विष्णु, धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में बुद्ध, महिषासुरमर्दिनी आदि की कांस्य प्रतिमाएं प्रमुख हैं।







चित्र-

संग्रहालय में विश्वविख्यात बाघ की गुफाओं के भित्ति चित्रों की अनुलिपियां भी प्रदर्शित हैं। इनको सर्व श्री नंदलाल बोस, भांड, आप्टे, अहमद आदि प्रसिद्ध चित्रकारों ने तैयार किया। इनके अतिरिक्त संग्रहालय में लघु चित्रों का भी संग्रह है। ये लघु चित्र मुगल, राजपूत, कांगड़ा, पहाड़ी एवं ग्वालियर शैलियों में निर्मित हैं। इनमें चंगेज खां का चित्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

अस्त्र-शस्त्र

संग्रहालय में संग्रहित अस्त-शस्त्रों में विभिन्न प्रकार की बन्दूकें, तोप, तलवार आदि हैं।

उत्खनित सामग्री

संग्रहालय में मोहन-जोदड़ो, विदिशा, उज्जैन, महेश्वर-नावदाटोली, आवरा, पवाया, इन्द्रगढ़ आदि पुरास्थलों पर किये गये उत्खननों में प्राप्त सामग्री भी संग्रहीत है। इनमें मृदभाण्ड, मृण्मुर्तियां, मनके, कर्णाभूषण आदि प्रमुख हैं। कुछ मृण्मुद्रायें अभिलिखित भी है।
संग्रहालय में एक ग्रन्थालय है जिसमें पुरातत्व, इतिहास, संस्कृति, धर्म एवं दर्शन से संबंधित चार हजार ग्रन्थ हैं। विद्वान एवं शोधार्थी ग्रंथालय में बैठकर ग्रंथो का अध्ययन कर सकते हैं। संग्रहालय में एक विक्रय पटल (म्यूजियम शॉप) भी है, जिसमें विभाग द्वारा तैयार की गई पुरावशेषो की प्रतिकृतियां एवं विभागीय प्रकाशन विक्रय हेतु उपलब्ध है। दर्शको, पर्यटकों की सुविधा के लिये विभाग द्वारा संग्रहालय में मार्गदर्शक की सेवाएं भी उपलब्ध है।
संग्रहालय सोमवार एवं राजपत्रित अवकाश को छोड़कर प्रतिदिन प्रातः दस बजे से सायं 5 बजे तक खुला रहता है। संग्रहालय में प्रवेश शुल्क प्रत्येक भारतीय दर्शक के लिए दस रूपये तथा विदेशी पर्यटकों के सौ रूपये निर्धारित है।

दीर्घायें दीर्घा क्र.1

यह संग्रहाध्यक्ष का कक्ष है जिसमें विश्वप्रसिद्ध शालभंजिका भी प्रदर्शित है।

दीर्घा क्र.2

इन दीर्घा में प्रदर्शित पुरावशेषों में उदयगिरि एवं बेसनगर (विदिषा) से प्राप्त दूसरी शती ई. पूर्व के मकर गरूड़ एवं सिंह स्तंभ शीर्ष तथा पवाया से प्राप्त सूर्य एवं ताड़ वृक्ष की पांचवी शती ई. की मूर्तियां महत्वपूर्ण हैं प्रदर्शित दो सिंह स्तम्भ शीर्षों में एक चौकी पर चार सिंह आपस में पीठ सटाए उकड़ूं एवं दूसरे पर एक सिंह बैठा हुआ है। पवाया से प्राप्त सूर्य की मूर्ति अपने आप में अनूठी एवं दुर्लभ है इसमें सूर्य की आकृति दो पार्श्व में अंकित है।





दीर्घा क्र.3

इस दीर्घा में सिक्के, ताम्र मूर्तियां एवं बाघ की गुफाओं में बने भित्ति चित्रों की अनुकृतियां प्रदर्शित है। सिक्कों में आहत (पंचमार्क), इंडो-सीथियन, नागवंश के राजाओं, गघैया, दिल्ली के सुल्तानों, मुगल बादशाहों, मालवा के सुल्तान एवं ओरछा के बुंदेला राजाओं के सिक्के प्रदर्शित है। प्रदर्शित कांस्य मूर्तियों में शिव के विविध रूप, विष्णु, दत्तात्रेय, बोधिसत्व आदि की मूर्तियां हैं। बाघ के चित्रों की अनुलिपियों में बोधिसत्व, जुलूस द्रश्य, करूणा का दृष्य, संगीत समारोह, नायिका, गंधर्व आदि के चित्र हैं। ये अनुलिपियां सर्व श्री नंदलाल बोस, भांड, आप्टे, अहमद आदि प्रसिद्ध चित्रकारों ने तैयार की हैं।

दीर्घा क्र.4

यह विशिष्ट प्रतिमा दीर्घा है। इस दीर्घा में गुप्त, प्रतिहार, परमार एवं कच्छपघात कला शैलियों की श्रेष्ठतम मूर्तियां प्रदर्शित हैं। ये मूर्तियां शैव एवं वैष्णव सम्प्रदाय से संबंधित हैं। शैव मूर्तियों में कोटा से प्राप्त स्कन्ध-कार्तिकेय, उदयपुर से प्राप्त शिव, सुहानिया से प्राप्त वीणाधर शिव, उज्जैन से प्राप्त नटराज, विदिशा से प्राप्त उमा-महेश्वर, हेरम्ब गणेश की मूर्तियां महत्वपूर्ण हैं। वैष्णव मूर्तियों में वामन, शेषशायी विष्णु एवं घुसई से प्राप्त हरिहर की मूर्तियां भी विशिष्ट हैं। सुहानिया से प्राप्त ब्रह्मा, पार्वती, गणेश एवं नंदी कच्छपघातकालीन श्रेष्ठतम मूर्तियां है।






दीर्घा क्र.5

इस दीर्घा में प्रदर्शित पुरावशेषो में बेसनगर से प्राप्त किसी बौद्ध स्तूप की वेदिका का ऊपरी भाग अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसमें दोनों ओर बौद्ध धर्म से संबंधित घटनाओं को उकेरा गया है। एक ओर एक सिरे पर श्वेततकेतु हाथी को कमल धारण करते हुये दिखाया गया है। यह द्रश्य बृद्ध जन्म को प्रदर्शित करता है। दूसरे सिरे पर बना स्तूप बुद्ध के महापरिनिर्वाण को दर्शाता है। दूसरी ओर के द्रश्य में हाथी पर सवार राजा एवं घोड़े पर सवार युवराज को दिखाया गया है। इस द्रश्य की पहचान इस प्रकार की गई है- बेसनगर का राजा बुद्ध की अस्थियां ले जा रहा है। ये अस्थियां बेसनगर में निर्मित स्तूप में रखी गई। यह उष्णीय इसी स्तूप की वेदिका का है। इस पर उत्कीर्ण लेख द्वितीय-प्रथम शती ईसा पूर्व की ब्राह्मी लिपि में है। उष्णीय के अलावा वेदिका की सूची भी दीर्घा में प्रदर्शित है। पवाया से प्राप्त मणिभद्र यक्ष की मूर्ति भी काफी महत्वपूर्ण है। मूर्ति पर उत्कीर्ण लेख में कुषाण वंश के स्वामी शिवनंदिन के शासन का चौथा संवत् वर्ष अंकित है।



दीर्घा क्र.6

इस दीर्घा में बेसनगर (विदिषा) से प्राप्त गुप्तकालीन महिषासुरमर्दिनी, नृसिंह, आवक्ष विष्णु, सप्त मातृकाएं, एक मुखी शिवलिंग एवं कायोत्सर्ग मुद्रा में जैन तीर्थंकर की मूर्तियां प्रदर्शित है। ये मूर्तियां गुप्तकालीन चौथी-पांचवी शती ई. की मूर्तिकला के सुंदर नमूने हैं। मांसल शरीर सौष्ठव, सुंदर केश सज्जा इन मूर्तियों की सबसे बड़ी विशेषता है।






सिरदल--

दीर्घा क्र.6 एवं 7 के बीच में पवाया से प्राप्त पांचवी शती ई. का विष्णु मंदिर का खण्डित सिरदल प्रदर्शित है। इसमें सामने की ओर बाईं तरफ नृत्य एवं संगीत सभा का द्रश्य उकेरा गया है। इसमें विभिन्न वाद्ययंत्र बजाती महिला वादक दिखाई गई हैं। बीच में एक नर्तकी संगीत की स्वर लहरियों पर मोहक मुद्रा में नृत्य कर रही है। दासियों के साथ बैठी रानी नृत्य एवं संगीत का आनंद ले रही है। वाद्ययंत्रों में सप्ततंत्री वीणा (वियन्ची), बांसुरी, मृदंग एवं ढपली आदि शामिल है। दाहिनी ओर यज्ञ का द्रश्य है। इसके आगे राजा बलि विष्णु के वामन अवतार को तीन पग धरती का दान दे रहे हैं। राजा से दान मिलने पर विष्णु अपने असली रूप में आकर पहला पग उठाते हैं जो अंतरिक्ष तक पहुंच जाता है। यह वामन अवतार का त्रिविक्रम रूप है। ऊपरी भाग में छोटे-छोटे वर्गाकार खानों में आठ नृत्यांगनायें नृत्य की अलग-अलग मुद्राओं में है। दूसरी तरफ समुद्र मंथन का द्रश्य एवं स्कंद की मूर्तियां उत्कीर्ण है।



दीर्घा क्र.7

इस दीर्घा में पवाया (प्राचीन नाम पद्मावती) से प्राप्त बलराम एवं त्रिविक्रम, तुमैन (प्राचीन तुम्बवन) से प्राप्त स्कंद एवं गंगा, तेरही (प्राचीन तेरम्बी) से प्राप्त कुबेर, मंदसौर (प्राचीन दशपुर) से प्राप्त द्वारपाल की मूर्तियां प्रदर्शित हैं। ये मूर्तियां गुप्त एवं उत्तर गुप्त कालीन हैं। धन के देवता कुबेर के दायें हाथ में सुरापात्र एवं बायें हाथ में धन की थैली है।






दीर्घा क्र.8

इस दीर्घा में कोटा जिला शिवपुरी से प्राप्त सप्तमातृका, गजासुर वध शिव, बदोह से प्राप्त कृष्ण जन्म, विष्णु के कूर्म एवं वराह अवतारों, बेसनगर से प्राप्त चतुर्मुखी ब्रह्मा एवं ग्यारसपुर से प्राप्त चतुर्भुजी अम्बिका की मूर्तियां प्रदर्शित हैं। सप्तमातृकाओं की मूर्तियां कला एवं सौंदर्य की दृष्टि से अद्वितीय हैं। गजासुर वध की मूर्ति भी दुर्लभ है। इसमें शिव के 16 हाथ हैं। साधारणतया इस तरह की मूर्तियां में 10 हाथ ही होते हैं। विशाल कृष्ण जन्म की मूर्ति न केवल इस दीर्घा की बल्कि संग्रहालय की महत्वपूर्ण मूर्तियों में से एक है। ये मूर्तियां 8वीं से 10वीं शती ई. की है।





दीर्घा क्र.9

इस दीर्घा में बडोह (विदिशा) से प्राप्त विष्णु के अवतारों में यज्ञवराह, नृसिंह, वामन, राम, बलराम, सर्वतोभद्रिका, कुबेर, अष्टदिक्पाल, तेरही से प्राप्त महिषासुरमर्दिनी, बाघ जिला धार से प्राप्त माता शिशु, पढ़ावली से प्राप्त कल्याण सुन्दर की दो एवं सुहानिया से प्राप्त यम एवं वायु मूर्ति प्रदर्शित है। इनमें यज्ञवराह की विशालकाय मूर्ति, सर्वतोभद्रिका जिसमें गरूड़ासीन विष्णु, त्रिविक्रम, नृसिंह एवं वराह की मूर्तियां हैं तथा कल्याणसंदुर की मूर्तियां दीर्घा की विशिष्ट मूर्तियां हैं। ये मूर्तियां 9 वीं शती ई. की है।





दीर्घा क्र.10

इस दीर्घा में लघु चित्रों का प्रदर्शन किया गया है। ये लघु चित्र राजपूत, मुगल, कांगड़ा, पहाड़ी एवं ग्वालियर चित्र शैलियों के हैं। इन चित्रों में चंगेज खान, बाबर, हुमायूं, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब, बीरबल, नूरजहां, मुमताज, राजा मानसिंह के दरबार एवं शिकार का दृष्य, हम्मीरदेव, रानी लक्ष्मीबाई, सिंधिया महाराजाओं एवं राज परिवार के अन्य सदस्यों के चित्र प्रदर्शित हैं। विभिन्न चित्र शैलियों के चित्र इस दीर्घा में एक साथ प्रदर्शित किये जाने के कारण दर्शक इनका तुलनात्मक अध्ययन सुगमता से कर सकते हैं।

दीर्घा क्र.11-

इस दीर्घा में पवाया (पद्मावती) से प्राप्त मृण्मूर्तियाँ प्रदर्शित है। यह पुरा स्थल ग्वालियर जिले की डबरा तहसील मुख्यालय से लगभग 20 कि. मी. दूर स्थित है। पार्वती एवं सिंध नदियों के संगम पर स्थित पवाया के पुराने टीलों की खुदाई श्री गर्दे ने 1924-25, 1933-34 तथा 1941 के वर्षो में की थी। खुदाई में मिली मृण्मूर्तियों को संग्रह कर गूजरी महल संग्रहालय में रखा गया। इसी संग्रह से चुनी गई कुछ मृण्मूर्तियाँ इस दीर्घा में प्रदर्शित है। इनमें राम सीता की मृण्मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। नारियों की मूर्तियों में सुन्दर केश विन्यास देखते ही बनता है। सांचे में ढालकर बनाई गई इन मृण्मूर्तियों में गोल चेहरे एवं खुली हुई आंखे है। मुख पर हास्य एवं दुःख के भावों का सजीव रूपांकन है। ये मृण्मूर्तियाँ नाग एवं गुप्तकालीन कला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है।

दीर्घा क्र.12

इस दीर्घा में ग्वालियर, विदिशा एवं पढ़ावली से प्राप्त जैन तीर्थंकर आदिनाथ, पद्मनाथ, पार्शवनाथ, नेमिनाथ, धर्मनाथ एवं चंद्रप्रभु की मूर्तियाँ प्रदर्शित है। ये मूर्तियाँ ध्यान एवं कायोत्सर्ग मुद्रा में है। पादपीठ पर तीर्थंकरों के लक्षण खुदे हुये हैं जिनसे इनकी पहचान होती है। कुछ मूर्तियों पर लेख भी खुदे है। मुख्य रूप से ये मूर्तियाँ 11-12 वीं एवं 15-16 वीं शती ई. की है।

दीर्घा क्र.13

इस दीर्घा में वैष्णव मूर्तियों का प्रदर्शन किया गया है। इनमें ग्वालियर किले से प्राप्त स्थानक विष्णु, शेषशायी विष्णु, बलराम, कच्छप अवतार, सुहानिया से प्राप्त नृवराह, नृसिंह एवं राम सीता सहित चंदेरी एवं नरवर से प्राप्त वामन अवतार, सुनारी से प्राप्त योगनारायण विष्णु एवं गरूड़ासीन विष्णु की मूर्तियाँ है। ये मूर्तियाँ 9वीं शती ई. से 12 वीं शती ई. के मध्य की बनी हुई हैं। स्थानक विष्णु की मूर्तियों के परिकर में दशावतारों का भी अंकन है। शेषशायी-विष्णु की मूर्ति में शयन करते हुये विष्णु, विष्णु के पैर दबाती लक्ष्मी के साथ ब्रह्मा, गणेश, नवग्रह एवं मधुकैटभ नाम के असुर भी उत्कीर्ण हैं। बलराम की मूर्ति में दायें हाथ में चषक है एवं बायाँ हाथ कमर पर टिका (कटयावलम्बित मुद्रा) है। राम सीता की युगल मूर्ति भी उल्लेखनीय है। योगनारायण की मूर्ति के परिकर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं दशावतार भी उकेरे गये हैं। पालिशदार गरूड़ासीन विष्णु की मूर्ति के पादपीठ पर उत्कीर्ण लेख में विक्रम संवत् 1242 (1165 ई.) का उल्लेख है।

दीर्घा क्र.14-

दीर्घा में नरेसर से प्राप्त मातृका (योगिनी), ग्यारसपुर से प्राप्त गजासुरवध, पार्वती सुहानिया से प्राप्त वैद्यनाथ, पार्वती, उदयपुर से प्राप्त नटराज एवं विदिशा से प्राप्त उमा-महेश्वर की मूर्तियाँ प्रदर्शित हैं। मातृकाओं में श्री इन्द्राणी, श्री कुबेरी, श्री वैष्णवी, श्री वारूणी देवी, श्री वाराही, श्री माधाली, श्री याम्या, श्री देवी निवाऊ, श्री उमा देवी की मूर्तियाँ शामिल हैं। मातृकाओं की इन मूर्तियों में उनके वाहन भी बने हैं। मूर्ति के पादपीठ पर मातृका का नाम भी लिखा है। दीर्घा की सबसे महत्वपूर्ण मूर्ति गजासुर वध शिव की है। इस विशाल मूर्ति में शिव चतुर्भुजी हैं जबकि सामान्य तौर पर गजासुर वध मूर्तियों में शिव की दस भुजायें होती हैं। शिव के गले में मुंडास्थि माला (नर मुंड एवं अस्थियों की माला) है तथा मुख पर ‘विकट हास्य’का भाव है। शिव के पैरों के पास चामुण्डा नृत्य करते हुए दिखाई गई है। पार्वती, नटराज एवं उमा-महेश्वर की मूर्तियाँ भी मूर्ति शिल्प की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। प्रदर्शित मूर्तियाँ 11वीं-12वीं शती ई. की है।



दीर्घा क्र.15

इस दीर्घा में पढ़ावली एवं सुहानिया से प्राप्त गणेश कार्तिकेय की मूर्तियाँ प्रदर्शित हैं। चतुर्भुजी एवं अष्टभुजी गणेश की मूर्तियाँ आसनस्थ एवं नृत्य मुद्राओं में हैं। मुद्रा के लिहाज से ग्वालियर के किले से प्राप्त चतुर्भुजी गणेश की मूर्ति अपने आप में अनूठी है। चतुर्भुजी स्थानक कार्तिकेय की मूर्ति में पैरों के पास उनका वाहन मोर भी है। प्रदर्शित मूर्तियाँ 9वीं-10वीं शतीं ई. की है।

दीर्घा क्र.16

इस दीर्घा में सुहानिया से प्राप्त अग्नि, सूर्य (स्थानक), ब्रह्माणी, सरस्वती, पढ़ावली से प्राप्त चतुर्मुखी शिव, सूर्य (आसनस्थ) तथा बाघ से प्राप्त ब्रह्मा की मूर्तियाँ प्रदर्शित हैं। सुहानिया से प्राप्त एक अग्नि की मूर्ति की पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। सामान्यतः अग्नि की मूर्तियों में सिर पर जटा मुकुट एवं मुख पर दाढ़ी होती है। इस मूर्ति में सिर पर करंड मुकुट एवं मुख पर दाढ़ी नहीं है। साथ ही ऊपरी हाथों में गदा एंव पद्म हैं। ये दोनों आयुध विष्णु के हैं किन्तु निचले हाथ कमंडल और पैरों के पास उत्कीर्ण वाहन इस मूर्ति के अग्नि होने की पुष्टि करते हैं। अतः इस मूर्ति को अग्नि एवं विष्णु के सम्मिलित रूप अग्नि नारायण की मूर्ति माना गया है। सुहानिया से प्राप्त सूर्य की मूर्तियाँ समपाद स्थानक (खड़े हुये) एवं पढ़ावली से प्राप्त सूर्य की मूर्तियाँ समपाद आसनस्थ (बैठे हुये) मुद्रा में हैं। चतुर्मुखी शिव की मूर्तियों में एक मुख अघोर रूप में है। इसमें शिव को कपाल से सुरापान करते हुये दिखाया गया है। दीर्घा में प्रदर्शित मूर्तियाँ 11वीं-12वीं शती ई. की है।

दीर्घा क्र. 17 एवं 18

ये दोनों अभिलेख दीर्घायें हैं। इन दीर्घाओं में 28 अभिलेख प्रदर्शित हैं। ये अभिलेख द्वितीय शती ईसा पूर्व से 17 वीं शतीं ई. तक के हैं। इनकी भाषा प्राकृत, संस्कृत तथा लिपि ब्राह्मी, गुप्तकालीन ब्राह्मी, देवनागरी एवं अरबी, फारसी हैं। सबसे प्राचीन अभिलेख दूसरी शती ईसा पूर्व का महाराजा भागवत का स्तंभ लेख है जो बेसनगर विदिशा से प्राप्त हुआ हैं। इसके अलावा चन्द्रगुप्त द्वितीय के पुत्र गोविन्दगुप्त के सामंत प्रभाकर का ई. सन 467 का मंदसौर से प्राप्त अभिलेख, कुमारगुप्त के शासन काल का तुमैन से प्राप्त, कुमारगुप्त-बन्धुबर्मन की मंदसौर प्रशस्ति, नरवर्मन के शासन काल का मंदसौर से प्राप्त, मिहिर भोज का सागर ताल ग्वालियर से प्राप्त, विक्रम सिंह का दूबकुंड से प्राप्त, आसल्ल देव का नरवर से प्राप्त, महाराजा अभय देव का लखारी से प्राप्त, प्रतिहार नरेश कक्कुक का ग्वालियर से प्राप्त, परमार नरेश उदयादित्य का उदयपुर से प्राप्त, नलपुर के राजा अधिगदेव का सुरवाया से प्राप्त, शुल्की वंश के राजा नृसिंह का मासेर से प्राप्त, महमूद शाह खिलजी के शासन काल का नडेरी(गुना) से प्राप्त, मांडू के हुशंगशाह के शासन काल का सिंहपुर (गुना) से प्राप्त एवं आलमगीर औरंगजेब के शासन काल का चंदेरी से प्राप्त अभिलेख ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इन अभिलेखों से तत्कालीन इतिहास की महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक जानकारी मिलती है साथ ही इनसे लिपि के क्रमिक विकास के अध्ययन में भी सहायता मिलती है। अभिलेखों के अलावा इन दीर्घाओं में ब्राह्मी लिपि के उद्भव एवं विकास लेखन कला की प्राचीनता, प्राचीन लेखन सामग्री, इस्लामिक सुलेखन आदि की जानकारी भी प्रस्तुत की गई है।

नीलांबर दीर्घा--

महल के आंगन में खुले आकाश के नीचे बनाई इस दीर्घा को नीलांबर दीर्घा का नाम दिया गया है। इस दीर्घा में सबसे पहले विद्या की देवी सरस्वती तथा विध्नविनाषक, मांगल्य की वर्षा करने वाले देवता गणेश की मूर्तियां प्रदर्शित की गई हैं। इनके बाद पंचदेवोपासना के देवताओं शिव, विष्णु, सूर्य, गणेश, दुर्गा (महिषासुरमर्दिनी) की मूर्तियां हैं। पंचदेवोपासना के देवताओं के बाद त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु एवं उनके अवतार, शिव एवं उनके परिवार देवताओं की मूर्तियां हैं। इनके आगे दिक्पाल, तीर्थंकर, जैन शासन यक्ष, यक्षी एवं नायिकाओं की मूर्तियां प्रदर्शित हैं। नायिकाओं की मूर्तियों में अलसनायिका, सद्यस्नाता (नहाने के बाद बाल सुखाती नायिका) की मूर्तियां शामिल हैं।
संग्रहालय (महल) के आंगन में नीलांबर दीर्घा के अलावा कई सुंदर अलंकृत स्तंभ, स्थापत्य खंड एवं मूर्तियां भी प्रदर्शित हैं। यहां प्रदर्शित प्रतिहार कालीन दो लघु मंदिर बड़े महत्वपूर्ण हैं। इन्हें देखकर प्रतिहार कालीन मंदिरों की विषेषताओं को आसानी से समझा जा सकता है।

अस्त्र-शस्त्र दीर्घा-

यह दीर्घा महल के तलघर में बनाई गई हैं। इसमें पाषाणयुगीन मानव द्वारा उपयोग में लाये गये पत्थर के हस्त कुठार, कुल्हाड़ी, खुरचनी आदि प्रदर्शित किये गये हैं। इन हथियारों को बनाने की विधियों को चित्रों द्वारा दर्शाया गया है। इनके अलावा दीर्घा में तलवारें, कवच, ढाल, भाला, गदा तथा कई तरह की बंदूकें, तमन्चे, तोपें आदि भी प्रदर्शित हैं। अस्त्र-शस्त्रों के साथ सिक्कों के छायाचित्र, पाषाण मूर्तियां, धातु मूर्तियां एवं लघु चित्र भी प्रदर्शित हैं जिनमें तरह-तरह के हथियारों का रूपांकन है।

संग्रहालय का गौरव

गूजरी महल संग्रहालय अपने संग्रह की दुर्लभ मूर्तियों के कारण देश विदेश में अपनी एक अलग पहचान बनाये हुये है। विदेशों में आयोजित भारत महोत्सवों में इस संग्रहालय की कई मूर्तियां प्रदर्शित की गई हैं। ये मूर्तियां मूर्ति-विज्ञान एवं शिल्प सौन्दर्य की दृष्टि से विलक्षण मूर्तियां होने से अन्तर्राष्ट्रीय महोत्सवों में समय-समय पर भेजी गई हैं। इन मूर्तियों ने गूजरी महल संग्रहालय की कीर्ति देश की सीमाओं के बाहर विदेशों में भी फैलाई है। निःसंदेह ये मूर्तियां संग्रहालय का गौरव है। ऐसी कुछ विशिष्ट मूर्तियों का विवरण निम्नानुसार है--





शाल भंजिका--

यह अद्वितीय मूर्ति गूजरी महल संग्रहालय की पहचान बन गई है। शालभंजिका की यह मूर्ति विदिशा जिले के ग्यारसपुर नामक स्थान से प्राप्त हुई थी। दुर्भाग्यवश मूर्ति अपने पूर्ण रूप से नहीं है। मूर्ति के हाथ एवं पैर टूटे हुए हैं। खण्डित अवस्था में भी यह मूर्ति शिल्प कला का अनुपम उदाहरण है। नारी सौन्दर्य की सभी परिभाषायें एवं उपमायें इसके सामने फीकी पड़ जाती हैं। मुख पर विद्यमान मंद हास्य, केश सज्जा, आभूषण एवं अधोवस्त्र पर बने डिजाइन मूर्ति को विषिष्टता प्रदान करते हैं। मूर्ति का निर्माण काल 10वीं शती ई. है। यह मूर्ति फ्रांस एवं ब्रिटेन में आयोजित भारत महोत्सवों में प्रदर्शित की गई है।

गजासुर वध-

गजासुर वध की यह मूर्ति ग्यारसपुर से प्राप्त हुई है। इस मूर्ति में शिव को गजासुर नामक असुर को मारते हुए दिखाया गया है। मूर्ति का ऊपरी भाग खण्डित है। चतुर्भुजी शिव के मुख पर विकट हास्य के भाव हैं। शिव अपने शरीर पर मुण्डमाला धारण किये हुए हैं। पैरों के पास चामुण्डा नृत्य मुद्रा में है। सिर पर जटा जूट एवं अन्य अलंकरण हैं। प्रतिमा के परिकर में रत्न पुष्प की श्रृंखला है। यह मूर्ति 10वीं शती ई. की है। इसे फ्रांस एवं ब्रिटेन में आयोजित भारत महोत्सवों में प्रदर्शित किया गया है।





नटराज--

नटराज की यह मूर्ति (उदयपुर) से प्राप्त हुई है। यह किसी मंदिर की शुकनासिका है जिसमें 10 भुजी शिव नृत्य मुद्रा में उत्कीर्ण हैं। शास्त्रों में नृत्यरत शिव को नटराज कहा गया है, यह मूर्ति 10वीं शती ई. की है। इसे साँन फ्रांसिस्को में देवताओं पर आधारित प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया है।

समय प्रातः 10 से शाम 5 बजे तक
प्रवेश शुल्क
1- भारतीय दर्शक रू. 10.00 
2- विदेशी दर्शक रू. 100.00 
3- फोटोग्राफी रू. 50.00 
4- विडियों ग्राफी रू. 200.00 
नोट
1- 15 वर्ष तक की आयु के बच्चों एवं विकलांग के लिये प्रवेश निशुल्क रहेगा।
2- सोमवार राजपत्रित अवकाश के दिन संग्रहालय बंद रहेगा।