आप यहाँ हैं   >>   Skip Navigation Linksहोम > संग्रहालय > राज्य स्तरीय संग्रहालय

रानी दुर्गावती संग्रहालय जबलपुर

स्थिति

मध्यप्रदेश के पूर्वी अंचल का सम्भागीय मुख्यालय जबलपुर पुण्य सलिला नर्मदा नदी के उत्तरी ओर स्थित है। यह ऐतिहासिक नगर देश के बडे़ नगरों यथा दिल्ली वाराणसी इलाहाबाद कानपुर नागपुर भोपाल] ग्वालियर सागर आदि से सडक व रेलमार्ग द्वारा जुडा हुआ है।

जबलपुर अंचल प्राचीन काल से ही समृद्ध क्षेत्र रहा है। मौर्यकाल का महत्वपूर्ण साक्ष्य रूपनाथ का लघु शिलालेख है] जो सम्राट अशोक द्वारा उत्कीर्ण करवाया गया था। मौर्यो के बाद शुंग, सातवाहन, कुषाण, शक भी यहां के शासक रहे। सातवाहन कालीन अश्वमेध यज्ञ की सूचना देने वाला बघोरा से प्राप्त शिवघोश का शिलालेश एवं कुषाण-शक क्षत्रप कालीन अभिलिखित यक्षी प्रतिमा का भेड़ाघाट जबलपुर अंचल से प्राप्ति क्षेत्रीय इतिहास के महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। बुधगुप्त व जयनाथ के ताम्र पत्र गुप्त काल के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। कलचुरि काल में त्रिपुरी डाहल मण्डल की राजधानी था जहां से लगभग 500 वर्ष कलचुरि शासको ने विशाल भूभाग पर शासन किया। इसके बाद गोंड वंश में संग्रामशाह, दलपतिशाह व रानी दुर्गावती जैसे साहसी व प्रतापी शासक हुए है।

कलचुरि काल में जबलपुर को जाउली पत्तल या जाबालिपत्तन कहा जाता था। इस समय बड़े पैमाने पर मंदिरों] मठों व मूर्तियों का निर्माण हुआ] जिसमें कई कलाकेन्द्र यथा बिलहरी] कारीतलाई] तिगवां] तेवर एवं भेडाघाट आदि स्थापित हुए।

संग्रहालय की स्थापना-

रानी दुर्गावती संग्रहालय का आकर्षक भवन द्विमंजिला एवं संग्रहालय विज्ञान के निर्दिष्ट सिंद्धान्तों व आवशकता के अनुरूप है। संग्रहालय में भूतल पर चार दीर्घायें एवं एक कला वीथिका आडोटोरियम हाल है। प्रथम तल पर भी चार दीर्घायें है। इन दीर्घाओं में शैव दीर्घा, वैष्णव दीर्घा, जैन दीर्घा, सूचकांक दीर्घा, उत्खनन अभिलेख दीर्घा, मुद्रा दीर्घा एवं आदिवासी कला दीर्घा है। (एक गलियारें में चौसठ योगिनियों के छायाचित्र प्रदर्शित है) इन दीर्घाओं में संग्रहालय के संग्रह की चयनित कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है, शेस कलाकृतियां आरक्षित संग्रह के रूप में रखी गई हैं। आरक्षित संग्रह से पुनः चयनित कर अपेक्षाकृत कम महत्व की प्रस्तर कलाकृतियों को संग्रहालय प्रांगण के उद्यान में मुक्ताकाश प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय में कुल 6163 पुरावशेष संग्रहीत है। संग्रहालय की दीर्घाओं का विवरण निम्नानुसार है।



इण्डेक्स वीथिका

संग्रहालय का प्रवेश हाल ही इण्डेक्स वीथी है जिसमें एक ओर रिशेप्शन काउन्टर एवं दूसरी ओर विभागीय प्रकाशन का काउन्टर है। सामने रानी दुर्गावती की गजारूढ मूर्ति तथा उपर भित्ति पर रानी दुर्गावती के जीवन पर आधरित चित्र विवरण सहित प्रदर्शित है। दीर्घा में प्रदर्शित प्रस्तर प्रतिमाओं में कला के श्रेष्ठ उदाहरण यथा ध्यानी बुद्ध बोधिस्वत्व, स्थानक बृद्ध, वोधिसत्व पदमाणि, बौद्धदेवी तारा, स्खलितवसना आदि प्रतिमाये प्रदर्शित है। जबलपुर नगर के समीप स्थित तेवर ग्राम प्राचीन (त्रिपुरी) बौद्धधर्म का महत्वपूर्ण केन्द्र था वहां से उक्त बौद्व प्रतिमायें संग्रहीत की गई हैं।





शैव दीर्घा

शैव दीर्घा में प्रदर्शित कलाकृतियां शैव धर्म से संबंधित है, इनमें नृत्यरत अष्ट भुजी गणेश की उत्कृष्ट प्रतिमा है। गणेष के ऊपरी दायें&बायें हाथ में नाग तथा अन्य भुजाओं में परशु, स्वदंत, मोदक पात्र आदि का आलेखन है। उमामहेशर प्रतिमा में समस्त शैव परिवार शिल्पांकित है। शिव की वाम जंघा पर आसीन पार्वती के हाथ में दर्पण है। शिव के हाथ में पुष्प त्रिषूल, नाग व आलिंगनरत् है।

पैरो के मध्य में दाये गणेश वाये कर्तिकेय तथा मध्य में भृंगी,नदी तथा सिंह दृष्टव्य है। दूसरी उमामहेश्वर प्रतिमाओं में रावण को कैलाश पर्वत उठाते हुये दिखाया है। दीर्घा में प्रदर्शित दो अन्य उमामहेश्वर प्रतिमाओं में शिव को उमा के मुख के समीप उंगली रखे विशिष्ट अनुराग प्रदर्शित करते दिखाया है। अर्धनारीश्वर प्रतिमा में दक्षिणांग शिव व वामांग पार्वती है सभी आभूषणों से सुसज्जित प्रतिमा में भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति है, जो कलचुरि कला की महत्वपूर्ण कृति है।

शिव व विष्णु के संयुक्त स्वरूप को प्रदर्शित करती हरिहर प्रतिमाये भी कलचुरि कला को महत्वपूर्ण कृतियां है। दीर्घा की अन्य प्रतिमाओं में भैरव, शक्ति-गणेश व पार्वती की प्रतिमाओं प्रदर्शित है द्विभंग भैरव प्रतिमा में धम्मिल केश राशि व यथेष्ट अलंकरण है, हाथों में कपाल पात्र व खटवांग है। शाक्ति-गणेश की यह प्रतिमा शैलीगत आधार पर यद्यपि कलचुरि कला की कृति है, किन्तु इसमें लोक कला का प्रभाव प्रतीत होता है। यह सभी आभूषणों से सुसज्जित एक आलिंगन प्रतिमा है। पार्वती की समभंग स्थानक प्रतिमा में मुख पर ध्यानजनित आभा परिलक्षित होती है। संतुलित तालमान, पारदर्शी वस्त्रों का आलेखन कलचुरि कला के प्रथम चरण का द्योतक है।

शैव दीर्घा में प्रदर्शित 20 प्रतिमाओं में गणेश, शिव वीणाधर नटेश, अर्धनारीश्वर, पार्वती, हरिहर व शक्ति गणेश शैलीगत आधार पर कलचुरि कला के प्रथम चरण 9&10 वी शताब्दी की हैं, किन्तु चौसर क्रीड़ारत उमा महेश्वर एवं अन्य उमा महेश्वर प्रतिमाओें में शिल्पांकन की बारीकी, तीखापन तथा अलंकरण की वाहुल्यता का दिग्दर्शन होता है जो कलचुरि शैली के चरमोत्कर्ष काल 11&12 शती ई. की है।





वैष्णव दीर्घा -

वैष्णव दीर्घा में प्रमुख रूप से विष्णु तथा उनके प्रमुख अवतारों की प्रतिमायें प्रदर्शित हैं। इनमें गरूड़ासीन लक्ष्मी नारायण, स्थानक विष्णु, नृसिंह, वराह, वामन, त्रिविक्रम, बलराम, आयुध पुरूष तथा गरूड़ मुख्य हैं। दीर्घा की विशिष्ट प्रतिमाओं में विष्णु की समपाद स्थानक प्रतिमा विशेष उल्लेखनीय है, जिसके अद्र्वनिमीलित नेत्र व भावपूर्ण मुद्रा तथा आभूषणों का सुन्दर आलेखन, संतुलित तालमान व सुन्दर अवयवों की रचना कलचुरि कला के प्रथम चरण की ओर इंगित करते हैं। प्रभामंडल पर दशावतारों का शिल्पांकन व अधिष्ठान पर भूदेवी का अंकन हैं। बरहाटा जिला नरसिंहपुर से प्राप्त इस प्रतिमा के अतिरिक्त समपाद स्थानक विष्णु की तीन अन्य प्रतिमायें भी प्रदर्शित हैं, जिसमें एक मनकेड़ी तथा दो जबलपुर से प्राप्त हुए हैं।

अन्य महत्वपूर्ण प्रतिमाओं मे नृवराह की सुंदर प्रतिमा हैं। कलचुरि कालीन इस वराह प्रतिमा में विष्णु को पृथ्वी का उद्वार करते दिखाया है। जो वराह मुखी मानवाकार प्रत्यालीढ शिल्पांकन है। सभी आभूषणों से सुसज्जित वराह के हाथों में चक्र, शंख, गदा आयुध हैं। बाई ऊपरी भुजा पर भूदेवी को उठाये हुए प्रदर्शित है। विष्णु के अन्य अद्र्वमानवीय अवतार नृसिंह को दैत्य हिरन्यकश्यपु के उदर को विदीर्ण करते हुए दिखाया गया है। चतुर्भुजी नृसिंह के दोनों हाथ ऊपर की ओर उठे हुए हैं। अन्य महत्वपूर्ण प्रतिमाओं में वामन की समपाद स्थानक प्रतिमा आभूषणों से सुसज्जित कलचुरि कला की महत्वपूर्ण कृति है। भगवान विष्णु के वामन अवतार के द्वितीय चरण अर्थात वामन द्वारा अपने पैर का विस्तार कर तीन पग पृथ्वी नापते हुऐ स्वरूप को त्रिविक्रम कहा जाता है। उसी कथानक को व्यक्त करते हुये इस प्रतिमा में देव प्रत्यालीढ मुद्रा में सभी आभूषणों से सुसज्जित शिल्पांकित है। दीर्घा में बलराम की दो प्रतिमाये प्रदर्शित हैं। एक द्विभंग में चतुर्भुजी शिल्पांकन है। नाग फणों से छत्र युक्त बलराम के वायें हाथ माँ हल व चक्र है । दाये हाथ में पुष्प व सम्भवतः मूसल का आलेखन था, जो भग्न है। दूसरी महत्वपूर्ण बलराम प्रतिमा लगभग 6&7 वी शती ई की है। जिसमें पार्शव में नाग कुण्डली व नाग छत्र है दाया हाथ ऊपर उठा हुआ तथा वाये में सुरापात्र हैं। यह प्रतिमा गुप्तोत्तर कला की महत्वपूर्ण कृति हैं। अन्य प्रतिमाओं में गरूड़, चतुष्टिका तथा ताडशीर्ष है।

संग्रहालय में प्रदर्शित वैष्णव प्रतिमाओं में कलचुरिकाल के दोनों चरणों की शैलीगत विशेषताओं के साथ संतुलित तालमान, अलंकरण भव्यता एवं मौलिकता का समावेश है।

जैन दीर्घा

इस दीर्घा में प्रदर्शित जबलपुर अंचल के जैन कला केन्द्रों से संग्रहीत की गई है, जो कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण है इनमें तीर्थंकर आदिनाथ की पदमासनस्थ प्रतिमा ध्यान मुद्रा मे निरूपित है, जिसमें उनके दोनों स्कन्धों के मध्य में जटाजूट झूल रहे हैं। आसनपट्टिका पर ध्वज लांछन वृषभ का आलेखन हैं, सिहपीठिका पर दाये पक्ष गोमुख एवं बाये यक्षी चक्रेश्वरी का आलेखन हैं। दूसरी प्रतिमा तीर्थंकर पार्श्वनाथ में कुण्डलित नाग पीठ पर पदमासन मे ध्यानस्थ शिल्पांकित है। प्रभामंडल के ऊपर नाग छत्र है। ऊपर गज अभिषेकरत व विद्याधर युगलों का शिल्पांकन है। सिंह पीठिका पर नवग्रह तथा यक्ष-यक्षी का आलेखन हैं। इसी प्रकार तीर्थंकर सम्भवनाथ की कायोत्सर्ग प्रतिमा भी कलचुरि कला के श्रेष्ठ मानदंडों को प्रदर्शित करती हैं। सभी पार्शवचरो के आलेखन सहित आसन पटल पर लांछन अश्व अंकित हैं।

एक अन्य कायोत्सर्ग प्रतिमा तीर्थंकर चन्द्रप्रभ की है, जो सभी तीर्थकर लक्षणों से युक्त है। सिंहपीठिका पर यक्ष-यक्षी तथा आसन पट्ट पर लांछन चंद्र का आलेखन हैं । दीर्घा में प्रदर्शित अन्य कायोत्सर्ग प्रतिमा तीर्थकर शांतिनाथ की है, उनका ध्वज लांछन मृग हैं। तीर्थंकर यथेष्ट अलंकरण से सुसज्जित है। इसके अतिरिक्त दीर्घा में अम्बिका, ध्यानस्त आदिनाथ एवं जैन परिचारक व नवग्रह की प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं।

अप्सरा-दिक्पाल दीर्घा--

संग्रहालय के प्रथम तल पर प्रथम हाल में अप्सरा व दिक्पाल दीर्घा हैं। इस दीर्घा में सुरसुन्दरी, स्खलित वसना, नायिका सद्यस्नाता, वेणु वादिनी एवं सुरसुन्दरी प्रतिमाओं में कलचुरि कला के श्रेष्ठ मानदण्ड विविध आभूषणों, सुन्दर केश विन्यास, मोहक अंग संरचना तथा सुगठित मांसल अवयवों की संरचना का दिग्दर्शन होता है। सभी अप्सरा या सुर सुन्दरियां यथेष्ट अलंकरण से सुसज्जित होकर विभिन्न मुद्राओं, कमनीय अंग संरचनाओं व भावो को सुन्दर ढंग से अभिव्यक्त करती हैं, जो कलचुरि कला की महत्वपूर्ण कृतियां हैं। सुरसुन्दरियों की आकर्षक चितवन, स्खलित वसना की कमनीय क्षीण कटि व उन्नत उरोज, सद्यस्नाता की वेणी से टपकती जल कणिकायें भाव प्रवीणता तथा अंग-प्रत्यंगो में लालित्य, वेणुवादिनी की आकर्षक केश सज्जा व भावांकन क्षेत्रीय विशेषताओं से परिपूर्ण हैं।
दिक्पाल प्रतिमाओं में इंद्र, अग्नि, वरूण, कुबेर, यम प्रतिमाओं के अतिरिक्त अग्नि स्वाहा की आलिगंन प्रतिमा विशेष उल्लेखनीय हैं। जिसमें दिक्पाल अग्नि की वाम जंघा पर आसीन अग्नि स्वाहा के आकर्षक आलेखन हैं, अन्य कला कृतियों में बौद्व देवी तारा, कल्याण देवी, तथा युद्व प्रयाण दृष्य भी विशेष महत्व के हैं।

अभिलेख दीर्घा-

जबलपुर संग्रहालय में अभिलेख एवं ताम्रपत्र यद्यपि कम मात्रा में संग्रहीत है, किन्तु इनमें बाघोरा से प्राप्त सातवाहन कालीन शिलालेख संग्रहालय का सर्वाधिक प्राचीन लेख है, इस अभिलेख में यज्ञ-यूप तथा अश्व भी उत्कीर्णित हैं, इस लेख में ईसा पूर्व प्रथम शती के शिवघोष नामक शासक का नाम मिलता है। बिलासपुर जिले के लंहगाभाटा से प्राप्त अभिलेख देवनगरी लिपि मे हैं, जो क्षेत्रीय कौरव वंश के राजाओं से संबंधित है। भटगांव से प्राप्त अभिलेख परवर्ती परमार तथा नागवंश के राजाओं से संबंधित है। दोनी जिला दमोह का मूर्ति पादपीठ लेख भी प्रदर्शित हैं। ताम्र पत्रों में बुधगुप्त के समय का शंकरपुरा जिला सीधी से प्राप्त ई. सन 487 का ताम्रपत्र हैं जिसमें महाराज हरिवर्मा का नाम मिलता हैं। कटनी से प्राप्त गु.स. 182 (ई सन 581) का उच्चकल्प महाराज जयनाथ का ताम्रपत्र, रीवा से प्राप्त कर्णदेव कलचुरि का ई. सन 1055 का ताम्र पत्र, पवई जिला उमरिया से प्राप्त कलचुरि विक्रमसिंह देव का ई. 1193 का ताम्र पत्र दीर्घा में प्रदर्शित हैं । इसके अतिरिक्त ककरहेटा जिला जबलपुर के उत्खनन से प्राप्त पुरासामग्री तथा ठिढवारा जिला कटनी की पुरासामग्री भी प्रदर्शित है।

चैसठ योगिनी दीर्घा--

कलचुरि काल में योगिनी काल सम्प्रदाय का व्यापक प्रसार था। योगिनी शक्ति का ही एक रूप है योग एवं विविध उपासना के माध्यम से शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त करना योगिनी पूजा का उद्देश्य था। भेड़ाघाट में प्रसिद्व चैसठ योगिनी मंदिर है, वहां पर संग्रहीत योगिनियों के छायाचित्रों को मूल स्थान के क्रम से इस दीर्घा में प्रदर्शित किया गया हं।

मुद्रा दीर्घा-

प्रथम तल पर स्थित वीथी में मुद्रा के उदभव से लेकर विकास के क्रम को प्रदर्शित किया गया है। चादी के आहत सिक्कों, ताबें के कुषाण सिक्के, पृथक-पृथक शोकेश मे प्रदर्शित हैं। गुप्त सिक्के संग्रहालय के संग्रह में न होने के कारण उनके छायाचित्र व लीजेण्ड के चार्ट प्रदर्शित किये गये हैं। इण्डो सेसानियन, नाग व कलचुरि शासकों के मुद्राओं को भी प्रदर्शित किया गया हैं। इसके बाद में दिल्ली सल्तनत, मुगल, उत्तर मुगल, ब्रिटिश, सिन्धिया रियासत आदि के सिक्के भी प्रदर्शित हैं।

आदिवासी कला दीर्घा

इस दीर्घा मे जबलपुर अंचल एवं गोंडवाना की आदिवासी संस्कृति को दिखाया गया है। गोंड व बैगा जनजाति का रहन-सहन खान-पान वेषभूषा, आभूषण, पूजन सामग्री, वादय यंत्र एवं आवास आदि को माडलस, छायाचित्र एवं मूल सामग्री आदि के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।







मुक्ता काश प्रदर्शन--

संग्रहालय प्रांगण में संग्रहालय भवन के बाहर व उद्यान में सीमेन्ट पादपीठों पर प्रस्तर प्रतिमायें प्रदर्शित की गई है। इसमें कुषाण कालीन यक्षी प्रतिमायें, नंदी देवियां, द्वारशाखायें एवं अन्य कलाकृतियां है।






संग्रहालय की विशिष्ट कलाकृतियां-

संग्रहालय मे कई उत्कृष्ट कलाकृतियों का संग्रह है, इनमें चैसर क्रीड़ारत् उमा-महेश्वर, गरूड़ासीन लक्ष्मीनारायण, बलराम, सद्यस्नाता, स्खलितवसना, नदी देवियां, बोधिसत्व, ताडशीर्ष, अग्निस्वाहा, युद्व प्रयाण, पदमपाणि, बोधिसत्व बज्रसत्व, तारा, श्री कल्याण देवी आदि का ऊपर का उल्लेख किया जा चुका है, किन्तु एक विशिष्ट कृतियों का विवरण निम्नानुसार है

1- अलीक निद्रा-

वैष्णव वीथिका के सामने प्रदर्शित है। यह शिल्पकृति रूठे नायक तथा मनुहार करती नायिका के मौन अभिनय का शिल्पीय रूपांकन है। प्राकृत भाषा के कवि हाल द्वारा रचित गाथासप्त सती की एक गाथा में वर्णित दृष्य का रूपांकन शिल्पी ने मौलिकता के साथ किया हैं। इस फलक पर दो दृष्य हैं। फलक पर दायें ओर प्रथम दृष्य में तीन स्त्रियां बैठी हुई हैं। मध्य की नायिका प्रिय से मिलने के लिये आतुर है, उसके दोनों ओर एक-एक परिचारिका नायिका के श्रंगार में सहयोग कर रही हैं। 
फलक पर दाये पूर्व निश्चिन्त संकेत के अनुसार नायक उद्यान मे अपनी प्रियतमा की प्रतीक्षा कर रहा है, किसी कारणवश समय पर नहीं पहुंचने के कारण खिन्न नायक अपनी निराशा व अप्रसन्नता को व्यक्त करने के लिये निद्राभिभूत होने का अभिनय कर रहा है। नायिका किंचित विलम्व से पहुंचती है। तो प्रियतम को सोता हुआ पाती है। नायक की मुद्रा से स्पष्ट है कि वह कपट निद्रा का अभिनय कर रहा, जिसमें नायिका को यह समझते देर नहीं लगती कि उसका प्रियतम रूठकर कपट निद्रा कर उसकी प्रतीक्षा कर रहा हैं। इसकी पुष्टि के लिये नायिका चुपचाप नायक के सिरहाने बैठकर उसके कपोल पर चुबंन अंकित करती है, जिससे उसके अंग प्रत्यंग पुलकित हो जाते है और अलीक निद्रा स्पष्ट हो जाती हैं।

चैसर क्रीड़ारत उमा महेश्वर--

चैसर क्रीड़ारत उमा महेश्वर प्रतिमा मे अत्यन्त कलात्मकता व मनोविनोद का आलेखन है। दोनों ही सुन्दर आभूषणों से सुसज्जित चौसर खेल रहे है। शिव की मुख मुद्रा निर्विकार तथा पार्वती के मुख पर विजयोल्लास परिलक्षित है । दोनों की उंगलियां गोटियों के समीप है। प्रतिमा में भैरव, वीरभद्र, कार्तिकेय, रावण आदि का आलेखन है, किन्तु अधिष्टान पर मध्य मे नंदी के गले में पड़ी रस्सी को पार्वती की सखियां अपनी ओर खीचती हुई दिखायी गई है। पीछे दो पुरूषों के साथ परषुधारी, गणेष का भी आलेखन है। इस दृष्य मे पार्वती द्वारा नंदी को जीता जाना चित्रित है। 
उक्त दीर्घाओं व वाहय प्रांगण में प्रदर्शित पुरासामग्री के अतिरिक्त संग्रहालय के संग्रह में आरक्षित संग्रह भी है। संग्रहालय के कुल पुरावशेषों में 6163 नग है, जिसमें प्रस्तर कलाकृतियां, सिक्के अभिलेख, ताम्रपत्र आदि शामिल हैं।

- गरूडासीन लक्ष्मीनारायण-

कलचुरि कला के चत्र्मोत्कर्ष को छूने वाली अन्य कलाकृतियों में गरूड़ासीन लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा विशेष उल्लेखनीय हैं, जो 12 वी शती की उन्नत कला मानदंडो को अभिव्यक्त करती है। सभी आभूषणों से सुसज्जित गरूड़ासीन लक्ष्मीनारायण में विष्णु के हाथो के आयुध भग्न है। नीचे मानवाकार गरूड़ को भी सभी आभूषणों से अलंकृत दिखाया गया है। प्रतिमा में विष्णु के मुख पर आनंद का भाव तथा लक्ष्मी के मुख पर अनुराग जनित लज्जा के भाव है, जो विष्णु की वाम जंघा पर आसीन हैं। प्रतिमा मे ऊपर वितान के कोनों पर ब्रहमा व षिव मध्य मे योग नारायण तथा परिकर पर दसावतारों का आलेखन है।

4- अग्निस्वाहा-

संग्रहालय के प्रथम तल पर दिक्पाल दीर्घा में प्रदर्शित यह दुर्लभ प्रतिमा विशेष उल्लेखनीय है जिसमें दाडी मूछ युक्त दिक्पाल अग्नि को अपनी शक्ति स्वाहा के साथ अलिंगन मुद्रा में दिखाया गया है। कलचुरि कला की उत्कृष्ट कृति में शिल्पी ने भावों के साथ-साथ अपनी स्वछन्द अभिव्यक्ति को भी साकार रूप दिया है। जिसमें तारासने में बारीकी एवं तीखापन प्रतिमा के आकर्षण को अधिक बढ़ाता है।

समय - प्रातः 10-00 से शाम 5-00 तक

प्रवेश शुल्क

1- भारतीय दर्शक - रू. 10-00
2- विदेषी दर्शक - रू. 100-00
3- फोटोग्राफी - रू. 50-00
4- विडियों ग्राफी - रू. 200-00
नोटः- 
1- 15 वर्ष तक की आयु के बच्चों एवं विकलांग के लिये प्रवेश निशुल्क रहेगा।
2- सोमवार राजपत्रित अवकाश के दिन संग्रहालय बंद रहेगा।