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राज्य संग्रहालय भोपाल

राज्य संग्रहालय भोपाल:

राज्य संग्रहालय, भोपाल का एक नये स्वरूप में तथा नये भवन में 2 नवम्बर, 2005 को म.प्र. के माननीय मुख्यमंत्री के कर कमलों द्वारा उदघाटन हुआ। श्यामला हिल्स पर निर्मित यह नवीन संग्रहालय भवन वास्तुकला का सुन्दर उदाहरण है। इस संग्रहालय की स्थापना 1909 में नवाब सुल्तानजहाँ बेगम(1901&1926 ई.) द्वारा एडवर्ड संग्रहालय के नाम से की गयी थी, यह संग्रहालय अजायबघर के नाम से वर्तमान केन्द्रीय ग्रंथालय भवन में संचालित रहा। स्वतंत्रता के बाद बाणगंगा रोड़ स्थित भवन में स्थानान्तरित हुआ।  

इसमें भारत के हृदय-भाग मध्यप्रदेश की श्रेष्ठतम कलाओं और संस्कृति को आकर्षण ढंग से प्रदर्शित किया गया है। इस भव्य भवन में 17 वीथिकाएँ  हैं, जो विषयवार विभाजित हैं। इन दीर्घाओं में थीम दीर्घा, प्रागैतिहासिक एवं जीवाश्म, उत्खनित सामग्री, धातु प्रतिमा, अभिलेख, प्रतिमा, रॉयल कलेक्शन, टेक्सटाइल्स, स्वाधीनता संग्राम, डाक टिकिट-ऑटोग्राफ, पाण्डुलिपियों, लघुरंग चित्रों, मुद्राओं, अस्त्र-शस्त्र, बाघ-गुफा, मध्यकालीन दस्तावेज, दुर्लभ वाद्य-यंत्र आदि को सुव्यवस्थित ढॅग से प्रदर्शित किया गया है। 


थीम वीथीः



लकुलीश (4 थी शती ई.)        चन्द्रप्रभ (4 थी शती ई.)             बुद्ध (प्रथम शती ई.)

इस दीर्घा की कलाकृतियां मध्यप्रदेश की सभी मूर्तिकला शैलियों का थीम (सार) प्रस्तुत करती हैं। इस दीर्घा में ईसा पूर्व की द्वितीय शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी तक की कलाकृतियां प्रदर्शित हैं जो न केवल काल विशेष की शैली को प्रस्तुत कर रही हैं अपितु उनकी क्षेत्रीय उपशैलियों का दिग्दर्शन होता है।

म.प्र के विभिन्न संग्रहालयों की विषिष्ट एवं दुर्लभ कृतियाँ इस दीर्घा में प्रदर्शित हैं इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण भरहुत, सतना से शुंगकालीन यक्षी, मन्दसौर से प्राप्त गुप्त-औलिकरकालीन द्विलिंगी लकुलीश एवं कार्तिकेय, जबलपुर से प्राप्त गॅधार शैली के कुषाणकालीन बुद्ध, दुर्जनपुर विदिशा से प्राप्त गुप्तकालीन चन्द्रप्रभु आदि हैं। अन्य प्रतिमाए जो अपनी विशेषताओं व कलात्मकता के आधार पर विशिष्ट व दुर्लभ श्रैणी की हैं, वे राष्ट्रकूट, प्रतिहार,परमार, चन्देल, कच्छपघात, कलचुरि आदि शैलियों में निर्मित हैं।
 


जीवाश्म एवं प्रागैतिहासिक वीथीः

पादप जीवाश्म
हाथी दांत जीवाश्म

1978 में जिला पुरातत्व संघ मण्डला द्वारा घुघवा एवं सिलठार में इन जीवाश्मों का विशाल भंडार खोज निकाला गया, यहां उनके कुछ अवशेष एवं, हाथी दांत जो नर्मदा नदी, होशंगाबाद से प्राप्त हुए हैं उन्हे प्रदर्शित किया गया है।

प्रागैतिहासिक काल की जानकारी प्रदाय करने के लिए इस वीथिका में पाषाण उपकरण जो निम्नपुरापाषण, मध्यपुरापाषाण एवं उत्तर पुरापाषाणकाल तथा मध्यपाषाण एवं नव पाषाण काल में प्रयोग में लाये गये थे। उनको यहां प्रदर्शित किया गया है। इनमें हैण्डेक्स, क्लीवर, स्क्रेपर, ब्लेड, ब्यूरिन आदि पाषाण उपकरण प्रमुख हैं।     
 


              पाषाणयुगीन औजार


उत्खनन वीथीः

उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष

पुरातत्वीय उत्खनन के द्वारा ही प्राचीन सभ्यताओं के नगर प्रकाश में आए हैं। सिन्धु सभ्यता के मोहनजोदड़ो व हडप्पा इसके प्राचीनतम उदाहरण हैं। मध्यप्रदेश में आद्यैतिहासिक संस्कृति का प्रारंभ ताम्र्रपाषाण काल से होता है इस युग में मानव ने कृषि करना प्रारंभ किया था। इसके साथ-साथ ताम्र (तांबे) का प्रचलन शुरू हो गया था। इस संस्कृति के अवशेष बेसनगर, मंदसौर, कायथा, महेश्वर, नावदाटोली, मोड़ी, आवरा, एरण, नागदा, पिपल्यालोरका, आजादनगर (इन्दौर), दंगवाड़ा आदि स्थानों में मिले हैं।

इन सभी स्थानों के उत्खनन में इन बस्तियों के जनजीवन की झलक मिलती है। इस काल में मानव द्वारा सुन्दर बर्तन बनाए हैं, जिन पर विभिन्न आकर्षक चित्रकारी की जाती थी। तत्कालीन मानव झोपड़ी में रहता था, पर इन्होंने अपनी बस्ती भी बना ली थी। इस उत्खनित सामग्री वीथी में रूनिजा (उज्जैन), दंगवाड़ा (उज्जैन), सारंगपुर (राजगढ़), अटूदखास (खंडवा), पिपल्यालोरका (रायसेन), बेसनगर (विदिशा), पीतनगर (खरगौन), सावतपुर (सीहोर), गांगाखेड़ी (भोपाल), निन्नौर (सीहोर), मंदसौर, पवाया (ग्वालियर) एवं मोहनजोदड़ो उत्खननों से प्राप्त सामग्री प्रदर्शित है। उत्खननों में प्राप्त सामग्री मध्यप्रदेश की ताम्राश्मयुगीन संस्कृति पर विशद् प्रकाश डालती हैं।


प्रतिमा वीथीः



अंधकासुरवध                        त्रिविक्रम                              लज्जा गौरी
  (12वीं शती ई.)                   (10वीं शती ई.)                         (5वी शती ई.)

भारतीय इतिहास में मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण स्थान है। देश के मध्य भाग में स्थित होने से यहाँ  प्रागैतिहासिक काल से वर्तमान तक अनवरत रूप से मानव की सभ्यता पुष्पित एवं पल्लवित होती रही।

इस वीथिका में मध्यप्रदेश के प्रमुख स्थलों से प्राप्त प्रतिमाएं  जिनका कला की दृष्टि से महत्व है, उनका प्रदर्शन किया गया है। इनमें शुंग, गुप्त, राष्ट्रकूट, प्रतिहार, परमार, चंदेल, कलचुरि एवं कच्छपघात काल की प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं।

विशिष्ट प्रतिमाओं में गणेश, शिव, उमा-महेश्वर, लकुलीश, विष्णु, लक्ष्मी नारायण, सरस्वती, गजासुरवध, त्रिविक्रम, लज्जा गौरी, लक्ष्मी, महिषासुर मर्दिनी, जैन तीर्थंकर आदि महत्वपूर्ण है।

यहां प्रदर्शित चंदेल, कच्छपघात एवं कलचुरि कला में शिल्पी ने जहां शारीरिक सौंदर्य को प्रधानता दी है, वहीं परमार कला की प्रतिमाओं में मांसल, सौंदर्य भाव व तालमान की स्पष्ट अभिव्यक्ति के साथ लोक जीवन को स्थान दिया है।


धातु प्रतिमा वीथीः

इस दीर्घा में धार जिले के ग्राम भोपावर से प्राप्त 87 जैन कांस्य प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। इस दुर्लभ संग्रह प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ से लेकर 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर तक की धातु प्रतिमाएं सामान्यतः क्रमबद्ध श्रृंखला में प्राप्त हुई। ये प्रतिमाएं ध्यानस्थ एवं कायोत्सर्ग मुद्रा में निर्मित हैं। तीर्थंकर प्रतिमाओं के साथ ही जैन शासन देवी-देवता, यक्ष-यक्षिणी यथा गोमेध-अम्बिका, मातंग-श्रुतदेवी आदि मुख्य हैं। ये सभी प्रतिमाएं लगभग 10-11वीं शती ई. की हैं।

इन प्रतिमाओं के अतिरिक्त अन्य धातु की प्रतिमाओं को भी यहाँ प्रदर्शित किया गया है, जिनमें अलग-अलग राजवंशों एवं स्थानों से प्राप्त धातु प्रतिमाएं हैं। इनमें होलकर राजवंश, सिंधिया राजवंश, नेपाली धातु कला, बौद्ध धातु प्रतिमाओं सहित भोपाल रियासत के राजसी संग्रह से प्राप्त धातु प्रतिमाओं को भी समाहित किया गया है, जो 12वीं शती ई. से लेकर 20वीं शती ई. तक की हैं। इनमें सूर्य परमारकालीन लेखयुक्त, भैरव, लक्ष्मी, नृसिंह, राधा-कृष्ण, महिषासुर-मर्दिनी, विष्णु, राजसी प्रतिमाएं तथा पशु प्रतिमाएं आदि प्रमुख हैं। भोपाल नवाबों द्वारा क्रय एवं उपहारस्वरूप प्राप्त विदेशी धातु प्रतिमाओं यथा कम्बोडियन लायन, रोमन सोल्जर, चीनी राजा आदि धातु प्रतिमाएं विदेशी धातु कला का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिन्हें यूरोप, चीन, जापान, तुर्की तिब्बत और भारत के तमाम भागों से एकत्र किया गया है।


मुद्रा वीथीः-

इस दीर्घा में मुद्रा के उद्भव एवं विकास को प्रदर्शित करते हुए आहत मुद्राओं से लेकर मराठा काल तक की मुद्राओं में शामिल किया गया। दीर्घा में प्रदर्शित मुद्राओं में चांदी की आहत मुद्राएँ तांबे की जनपदीय, सातवाहन, कुषाण, क्षत्रप, नाग, इन्डो सिथियन, गुप्त शासकों की स्वर्ण मुद्राएँ, चन्देल-कलचुरि शासकों की स्वर्ण मुद्राएँ, परमार शासक उदयादित्य व नरवर्मन की स्वर्ण मुद्राएँ, चालुक्य एवं दक्षिण भारतीय शासकों की स्वर्ण मुद्राएँ एवं गधैया सिक्के हैं।  

सल्तनतकालीन स्वर्ण एवं रजत मुद्राएँ, शेरशाह सुरी] अकबर] जहाँगीर शाहजहाँ, औरंगजेब एवं परवर्ती मुगल शासकों के चांदी के सिक्के प्रदर्शित हैं। मुगलकालीन स्वर्ण मुद्राएँ विषेष आकर्षण का केन्द्र है। अन्य मुद्राओं में होलकर, सिंधिया, ब्रिटिश तथा बुरहानपुर के डॉ.मेजर गुप्ता द्वारा प्रदाय सिक्के प्रदर्शित हैं। 


प्राचीन अभिलेख वीथीः

अभिलेख वीथी में मध्यप्रदेश से प्राप्त पाषाण अभिलेख व ताम्रपत्र प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें प्रमुख पाषाण अभिलेखों में प्रतिहार] परमार शासकों द्वारा जारी प्रशस्ति, दान पत्र आदि हैं। अमेरा (विदिशा) के पुराने तालाब से परमार शासक नरवर्मन का शिलालेख, कुरैरा (शिवपुरी) से प्राप्त ताम्रपत्र में प्रतिहार शासक मलयवर्मन का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक देवनागरी लिपि, संस्कृत भाषा के तथा नस्ख लिपि, अरबी भाषा के शिलालेख भी इस वीथी में प्रदर्शित हैं जो तत्कालीन गौरव गाथा के जीवंत प्रमाण है।


लघु चित्रकला वीथीः

इस वीथिका में रामायण, महाभारत, कृष्ण लीला, विभिन्न देवी-देवताओं, मुगल व मराठा शासक एवं सरदारों के चित्र प्रदर्शित हैं। इनमें कृष्ण-राधा पर केंद्रित बारहमासा एवं राग-रागिनी चित्रों की प्रधानता है। प्रदर्शित चित्रों में राजा दशरथ का श्राद्ध कर्म, अहिल्या उद्धार, सीता स्वयंवर, भरतमिलाप, बारहमासा, महाभारत दृश्य, बड़वानल, द्वारिका सन्थागार एवं अकबर तथा महाराजा रणजीत सिंह का हाथी दांत निर्मित चित्र विशेष महत्वपूर्ण हैं। प्रदर्शित चित्रों की प्रमुख शैलियों में राजपूत, मुगल, मालवा एवं मराठा है। इनके अतिरिक्त पहाड़ी, कांगड़ा, कोटा, बूंदी, नाथद्वारा शैली के चित्र भी यहां प्रदर्शित हैं।

बाघ गुफाओं के भित्तिचित्र वीथी:

बाघ की गुफाएं, जिला धार में, इंदौर से पश्चिम में लगभग 140 कि.मी. की दूरी पर, बाघिनी नामक छोटी-सी नदी के बायें तट पर और विन्ध्य पर्वत के दक्षिण ढलान पर स्थित हैं। बाघ ग्राम से पांच मील दूर बाघ-कुक्षी मार्ग से थोड़ा हटकर बाघ की गुफाएं हैं।

यह स्थल उस विशाल प्राचीन मार्ग पर स्थित है, जो उत्तर से अजन्ता होकर सुदूर दक्षिण तक जाता है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी और ईस्वी सन् की 7वीं शताब्दी के मध्य, जब भारत के पश्चिमी भाग में बौद्ध धर्म अपनी ख्याति की पराकाष्ठा पर था। इसी समय चीन के बौद्ध धर्म के महान विद्वान यात्री फाहियान, हुएनसांग, और सुआनताई मध्य और पश्चिमी भारत आये थे। बाघ की गुफाएं लगभग 1600 वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध की दिव्यवार्ता प्रतिपादित करने हेतु निर्मित एवं चित्रित की गयी थीं।

बीसवीं शती के प्रथम चतुर्थांश में इन गुफाओं का विवरण कुछ प्रकाशनों के माध्यम से ज्ञात हुआ। पुरातत्व विभाग, मध्य भारत, ग्वालियर द्वारा यहां की चित्रकारी की प्रतिकृतियां तैयार करने के अतिरिक्त सफाई और सुरक्षा का कार्य भी किया गया। इन भित्तिचित्रों की प्रतिकृतियों को तैयार कराने का कार्य बीसवीं शती के दूसरे दशक 1920 से प्रारंभ कर 1939-40 तक चलता रहा। यहां पर प्रदर्शित प्रतिकृतियां एवं रेखाचित्र वर्ष 1921 से 1939 के मध्य तैयार किये गये हैं।

भित्तिचित्रों में फूल, पक्षी व पशुओं का चित्रण महत्वपूर्ण हैं। कमल पुष्प मूर्ति तथा चित्रकला दोनों में ही लोकप्रिय है, जो पवित्रता के अतिरिक्त यह शुद्धता व सद्गुण का प्रतीक है। बाघ की गुफाओं, में बुद्ध, बोधिसत्व चित्रों के अतिरिक्त राजदरवार, संगीत दृश्य, पुष्पलता दृश्य धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में बैठे बुद्ध, कपिलवस्तु का दृश्य, वाद्य यंत्र बजाते हुए नायिका एवं बोधिसत्व के चित्र महत्वपूर्ण हैं। बाघ की कला में अजन्ता के समान केवल धार्मिक विषय ही नहीं हैं, वरन् यहां पर मानवोचित भावों के चित्रण में वेगपूर्ण प्रवाह भी है। इनमें विशेष महत्वपूर्ण चित्रों को इस वीथिका में प्रदर्शित किया गया है। बाघ की गुफाएं प्राचीन भारत के स्वर्णिम युग की अद्वितीय देन हैं।


अस्त्र-शस्त्र वीथीः

मानव जीवन में अस्त्र-शस्त्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। मानव के विकास में हथियारों का विशेष क्रम देखने को मिलता है। प्रारंभ में मानव ने मुष्टिका, दांत एवं पशुओं के सींगो का उपयोग किया होगा। तत्पश्चात् वृक्षों की टहनियों का प्रयोग किया गया। धातु युग में अस्त्र-शस्त्रों को नवीन जीवन दिया जो अनवरत चलता रहा। शनैः-शनैः अस्त्र-शस्त्रों के विकास क्रम में धनुष, बाण एवं अन्य शस्त्रों का महत्व कम होने लगा और उनका स्थान आग्नेयास्त्रों, तोपों एवं बंदूकों ने ले लिया।

मराठा सैनिकों के अस्त्र एवं उपकरण पंचमेल किस्म के थे। उन्होंने नए अस्त्रों को अपनाया, किन्तु प्राचीन अस्त्रों का बहिष्कार नहीं किया। होलकर शासकों ने कई प्रकार की तलवारों यथा खड्ग, तेगा, दुधारा आदि का प्रयोग किया था। होलकरों के समय कटारी की कई श्रेणियां थी। इनमें जमदादू, चिलनुमा, त्रिकोणयुक्त खंजर, दुधारी कटार, जमधर, दौलिकानेह, बिछवा आदि थे। इनमें से जमधर, जमदादू, जमधर दौलिकानेह प्रकार की कटारें है। होलकरों ने गुज, जिरह बखतर, ढाल, कुल्हाड़ी, फरसा, गुप्ती, छुरी आदि का युद्धों में प्रयोग किया था। तोप का प्रचलन तो इल्तुतमिश के समय ही होने लगा था, किन्तु तोप का वास्तविक नमूना बाबर ने प्रस्तुत किया। जिसका आधार मानकर होलकरों ने अन्य तापें ढलवाई। सर्वाधिक तोपें महाराजा यशवंतराय होलकर प्रथम ने अपनी राजधानी भानपुरा में ढलवाई, जो मल्हारराव होल्कर द्वितीय, हरीराव होलकर एवं ई. 1857 के महान स्वतंत्रता संग्राम के समय उपयोग में आयी। होलकरों द्वारा प्रयुक्त कुछ महत्वपूर्ण बन्दूकें एवं रायफलें भी हैं। इनमें तोड़ेदार बन्दूक (मैचलाक), पत्थरकला (फिलंटलाक), बण्डल (कैराबाइन), मस्कट, टोपीदार बन्दूकं, बिचेस्टर गन, राइफल्स आदि हैं। इनके अतिरिक्त सिंधिया शासन काल की कड़ाबीन, तोड़दार, टोपीदार एवं तमचा बन्दूकें भी यहाँ सुरूचिपूर्ण ढंग से प्रदर्शित की गयी है।


हस्तलिखित ग्रन्थ वीथीः

लेखन के लिये सामग्री का चयन सामग्री की उपलब्धता एवं लेखों की प्रकृति के अनुसार पत्थर, तांबा, लोहा, चांदी जैसी स्थायी वस्तुओं पर उत्कीर्ण किये जाते थे। पुस्तकें एवं लम्बे-लम्बे अभिलेखों के लिखने के लिये भुर्जपत्र एवं ताड़पत्र प्राचीन भारत का एक सर्वसाधारण पदार्थ था। इसके बाद कागज अस्तित्व में आया और कई हस्तलिखित ग्रंथें की रचना, टीकाएँ और प्रतिलिपियाँ तैयार हुई। कागज के साथ-साथ सूती कपड़ा भी लेखन कार्य में उपयोग किया जाता था।

इस वीथिका में कागज पर देवनागरी लिपि एवं संस्कृत भाषा में संवत् 1756 में लिखित ‘श्री नैषधीयचरितम्’ काव्य ग्रन्थ है जिसके प्रतिलिपिकार श्री यशोदेवसूरी हैं। यह ग्रन्थ चंदवासा, जिला मंदसौर के श्री भैरोलालजी से प्राप्त हुआ था। रीतिकालीन महाकवि मतिराम विरचित ‘रसराज’ की यह प्रतिलिपि प्रारंभ में अपूर्ण है। वर्णवाटिका में ‘’प’ और ‘’य’ के विभेद के लिये ‘’य’ को ‘’प’ लिखा गया है। यह काव्य देवनागरीलिपि, हिन्दी भाषा में विक्रम संवत् 1898 में प्रतिलिपिकार श्री लालागजाधर द्वारा लिखा गया है। इसमें भी वर्णवाटिका में ‘’ब’ को ‘’व लिखा गया है। यह अपूर्ण टीक देवनागरीलिपि, हिन्दी भाषा में लिखी गयी। इसमें लिपिकार का नाम व समय नहीं मिलता है। मैहर वासी श्री शिवलाल रावत द्वारा संवत् 1880 में देवनागरी लिपि एवं हिन्दी भाषा में की गई प्रतिलिपि मूल रूप से तुलसीदास कृत ‘हनुमान विरूदावली’ की प्रतिलिपि है। 


राजसी संग्रह वीथीः


राजसी संग्रह

इस वीथी में भोपाल के नवाबों द्वारा क्रय की गई एवं समय-समय पर उपहारों में प्राप्त कलाकृतियों तथा उनके स्वयं के उपयोग की वस्तुयें प्रदर्शित है। भोपाल के नवाबों का इतिहास करीब 250 वर्ष प्राचीन है। मुगल शासकों के पश्चात् नवाबों के संरक्षण में एक नयी संस्कृति को आयाम मिला।

भोपाल की तहजीब एवं नफासत की प्रसिद्धि काफी रही है। नवाब सुल्तान जहाँ बेगम (1901-1926) भोपाल रियासत की हुक्मरान रहीं। इनकी कला एवं शिक्षा में गहन रूचि थी। बेगम सुल्तान जहाँ की कोशिशों से किंग एडवर्ड म्यूजियम स्थापित हुआ था। इस संग्रहालय के लिये कला वस्तुयें सुल्तान जहाँ बेगम और उनकी वालिदा शाहजहाँ बेगम (1868-1901) ने दुनिया के कोने-कोने से एकत्र की। इस संग्रह हेतु यूरोप, चीन, जापान, तुर्की, तिब्बत और भारत के तमाम भागों से कलाकृतियाँ एकत्र की गयी।

इस वीथी में प्रदर्शित अलंकृत कलाकृतियों में मीनाकारी युक्त सुराही, हुक्का, सुरमादानी, चीन मिट्टी की सामग्री में अलंकृत फूलदान, फ्लावर स्टेण्ड, पशु पक्षियों से युक्त पहाड़ी दृश्य आदि, हाथी दांत की सामग्री में डेªगन, छड़ी, जालीदार काम युक्त कलमदान, पेपर कटर, कमलाकृति कप, गुलाब पाश, अलंकृत गोल डिब्बा, हाथी दांत का चांदी से मढ़ा हुआ हुक्का आदि, चांदी की सामर्गी में गुलदस्ता, रथ, डेªगन अंकन युक्त तश्तरी, मयूराकृति इत्रदान, कामदार टे, आभूषण बॉक्स, चांदी की मखमली जूतियाँ,  सोने की पालिश युक्त चांदी का मकबरा तथा सोने की पालिशयुक्त चांदी का कप आदि प्रदर्शित है। इसके अतिरिक्त धातु के निर्मित पद्मपाणि अवलोकितेश्वर, कालीन विक्रेता,  सुनहरी कामदार दर्पण, फूलदान, अगेट स्टोन से निर्मित चायदानी एवं ओनिक्स प्लाजा को सुरूचि पूर्ण ढंग से शो केसों में प्रदर्शित किया गया है जो तत्कालीन भोपाल नवाबों की कलाप्रियता के परिचायक है।

इसके अतिरिक्त धातु एवं चीनी मिट्टी की तश्तरियां, लकड़ी एवं धातु के डिब्बे, फ्लावर पाट्स, चीनी मिट्टी, बीदरीवर्क, संगमरमर के बर्तन, सोने-चांदी के खिलौने व आभूषण, लकड़ी, सीप व धातु के खिलौने, पेन्टिंग्स, फोटोग्राफ्स तथा सिन्धिया घराने से संबंधित वाश बेसिन तथा लैम्प आदि भी प्रदर्शित हैं।


                 कारपेट सेलर                                                                     राजसी संग्रह


वस्त्र वीथीः


राजसी पोशाक

राजसी पगड़ी

इस वीथी में प्रदर्शित वस्त्र मध्यप्रदेश के भिन्न क्षेत्रों विशेषतः राजघरानों में प्रचलित परिधान और क्षेत्र विशेष के पारम्परिक वस्त्रों की झलक प्रस्तुत करते हैं। यहाँ भोपाल नवाब शाहजहां बेगम के कपड़े शरारा, दुपट्टा व जूतियां तथा नवाब परिवार की शेरवानियां, होलकर, बुन्देला तथा सिंधिया घराने की पगड़ियां कपड़े व होल्कर राजवंश के कालीन प्रदर्शित है। भोपाल नवाबों के लगभग 250 वर्ष के शासन काल में पली भोपाल की संस्कृति, तहजीब और नफासत से परिचित कराते जरी के कामयुक्त हाथी दांत के हत्थे वाला पंखा, कंघा केस और पवित्र कुरान के जुज़दान, भोपाल नवाब की नफ़ासत और यहां के ज़रदोजी कला की मिसाल है। कसीदाकारी से बना नवाब कुदसिया बेगम का चित्र कसीदायुक्त मोर, वृद्ध आदमी तथा प्राकृतिक दृश्य, कसीदाकारी के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। नवाब कुदसिया बेगम और वृद्ध आदमी के पोटे (कढ़ाई) चम्पू बाई द्वारा बनाए गए हैं, जबकि मोर पर लिखा गया कसीदा नवाब हमीदुल्ला खां की ताजपोशी के समय लिखा गया है।

भारत की बुनाई कला बेजोड़ मानी जाती है। यहां के कुछ बुनाई केंद्र यथा चन्देरी, महेश्वर, बाघ सदियों से अपनी पहचान बनाए हुए है। इस वीथी में प्रदर्शित महेश्वरी एवं चन्देरी साड़ियां तथा बाघ तथा चन्देरी प्रिंट के कपड़े सदियों पुरानी बुनाई परम्परा के जीवन्त नमूने हैं।

कपड़े पर प्रदर्शित पंखा, चमेली, आमड़ी तथा गदवाली आदि प्रिंट परम्परागत बाघ प्रिंट हैं। ये वानस्पतिक रंगों से तैयार किए गए हैं। इसी प्रकार चंदेरी और महेश्वरी साड़ियों का डिजाइन भी परम्परागत है और अपनी कला विरासत का अभिन्न अंग हैं। इसी प्रकार भोपाल नवाबों के समय से चले आ रहे जरदोजी, आरी, दबके आदि जरी के काम के कपड़े, बटुए ओर टीकोज़ी प्रसिद्ध हैं। क्षेत्रीय वस्त्र परम्पराओं को स्मरण कराते बुंदेलखण्ड, मालवा और भोपाल की पगड़ियां भी इस वीथिका को पहचान प्रदान करती हैं। वीथिका में प्रदर्शित चित्रित कांच का परदा, बघेल रियासतकालीन कला का उदाहरण है जिसका उपयोग परदे के रूप में किया जाता था।   


अभिलेख (दस्तावेज) वीथिकाः

होलकर व सिंधिया शासक एवं दस्तावेज


प्रदर्शित महत्वपूर्ण अभिलेख

प्रदर्शित महत्वपूर्ण दस्तावेज़

ग्वालियर राज्य, इंदौर राज्य, भोपाल राज्य, मध्यभारत राज्य, मध्य प्रान्त, सिंधिया एवं समझौते
 

प्रदर्शित महत्वपूर्ण अभिलेख: महत्वपूर्ण संधियां एवं समझौते प्रदर्शित किये गये हैं-16 फुट लंबी बुरहानपुर की संधि (1804) जो महाराजा सिंधिया तथा ब्रिटिश सरकार के बीच हुई थी, नवाब शाहजहां बेगम एवं भारत सरकार के बीच रेलवे के संबंध में समझौता (1890), भोपाल नवाब तथा ब्रिटिश सरकार के मध्य हुई रायसेन की संधि (1918), भोपाल नवाब तथा भारत सरकार के बीच समझौता (1949) आदि।

ग्वालियर, इंदौर एवं भोपाल रियासत के अभिलेख भी यहां प्रदर्शित किये गये हैं- फरूखसियत द्वारा दोस्त मोहम्मद खान को दिलेर-ए-जंग’का खिताब दिया गया (1930 हिजरी), नवाब शाहजहां बेगम को स्टार ऑफ़  इंडिया की उपाधि (1872), इंग्लैंड के राजा जार्ज पंचम की शाही उद्घोषणा (1919), लार्ड आकलैंड, लार्ड केनिंग एवं लार्ड डलहौजी का महाराजा होलकर को भेजा गया खरीता, नवाब हमीदुल्लाह का, वायसराय लार्ड ईरविन को पत्र (1926), देवी अहिल्याबाई होलकर की पुण्यतिथि के संबंध में (अगस्त, 1927, 1933), अपने नाटकों के संबंध में पृथ्वीराज कपूर का पत्र (1949)।

मध्यभारत राज्य से संबंधित महत्वपूर्ण अभिलेख भी प्रदर्शित किए गए हैं-सी.राजगोपालाचारी द्वारा भारत के गवर्न जनरल का पदभार ग्रहण (1948), महाराजा जीवाजीराव सिंधिया द्वारा मध्य भारत के राजप्रमुख का कार्यभार ग्रहण करने बाबत् (1948), मध्यभारत राज्य का प्रथम मंत्रिमंडल (1948), हैदराबाद में सफल पुलिस कार्यवाही के संबंध में प (1948-1949), प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (1952) एवं राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद का पत्र (1956) आदि।


स्वाधीनता संग्राम वीथिकाः

बुन्देला विद्रोह, 1942, महान क्रांति, 1857, स्वाधीनता आंदोलन, 1920-1947

प्रदर्शित महत्वपूर्ण अभिलेख: बुन्देला विद्रोह 1842 तथा 1857 के महान विद्रोह से संबंधित अभिलेख प्रदर्शित किये गये हैं। नवाब सिकन्दर जहाँ बेगम को व्यापारियों द्वारा सीहोर से भोपाल पलायन करने बाबत सूचना (1857), सुजात खान एवं उनके 70 अनुयायियों द्वारा बैरसिया पर आक्रमण (1857), ग्वालियर किले पर अंग्रेजों का कब्जा (1857), नाना साहब को पकड़ने के लिए इनाम की घोषणा हेतु जारी विज्ञप्ति (1857), नारायण सिंह की जेल से फरारी (1857), तात्या टोपे के नाम राजा मर्दनसिंह का पत्र (1857), रानी लक्ष्मीबाई का पत्र रानी लड़ई दुलैया के नाम (1857), नाना साहब के नाम राजा मर्दन सिंह का पत्र (1957), दिल्ली पर अंग्रेज सरकार का कब्जा एवं दिल्ली के बादशाह की गिरफ्तारी (1858), तात्या टोपे एवं राव साहेब की गिरफ्तारी हेतु उद्घोषणा (1858) सैनिक टुकड़ियों की सूची जिन्होंने विद्रोह किया अथवा जिनके हथियार छीन लिये गये (1958)।  

स्वाधीनता आंदोलन से संबंधित अभिलेख भी प्रदर्शित किये गये हैं-जलियावाला बाग हत्याकांड के संबंध में (1919), सुरजमल जैन के संबंध में सूचना (1923), महात्मा गांधी के सत्याग्रह के दौरान इंदौरवासियों के कर्तव्य संबंधी भाषण (1930), इंदौर की प्रभात फेरियों में विघ्न, (1930), स्वाधीनता  सेनानी लुफ्तउल्लाह खां नजमी का पत्र (1941) स्वाधीनता सेनानी शाकिर अली खान का पत्र (1941) एवं सुपरिन्टेन्डेंट सेंट्रल जेल, भोपाल का मेडीकल रिपोर्ट के संबंध में पत्र (1941), कांग्रेस की गतिविधियां (1942), ग्वालियर के छात्रों द्वारा सत्याग्रह (1942) महात्मा गांधी की भूख हड़ताल के संबंध में ग्वालियर राज्य में प्रचार-प्रसार पर रोक (1943), महात्मा गांधी के लिये प्रार्थना (1943), सुभाषचन्द्र बोस संबंधी समाचारों के प्रकाशन पर रोक (1944) एवं उनकी जयंती मनाने के संबंध में (1946) आदि।

इन अभिलेखों के अतिरिक्त महत्वपूर्ण व्यक्तियों एवं घटनाओं के छायाचित्र भी प्रदर्शित किये गये हैं।


डाक टिकिट एवं आटोग्राफ वीथीः

        प्रथम डाक टिकिट                                                प्रदर्शित डाक टिकिट
                                                       डाक टिकिट

                                    आटोग्राफ्स (हस्ताक्षर) एवं पत्र

संसार का सबसे पहला डाक टिकिट 1 मई 1840 को ब्रिटेन में एक पेन्स का जारी हुआ था। इस पर क्वीन विक्टोरिया का चित्र छपा था। 1863 में कोलम्बों में सबसे छोटा डाक टिकिट छपा था एवं सबसे बड़े आकार का डाक टिकिट चीन में 1931 में छपा था।

1947 से पहले भारत के 300 डाक टिकट जारी हुए जिनकी संख्या बढ़कर अब करीब 2900 हो गई है। सरकार ने डाक टिकिट संग्रहकर्ताओं के लिए हर शहर में डाक टिकिट केंद्र बना दिए हैं जहां से वे नए पुराने टिकिट खरीद सकते हैं। डाक टिकिट संग्रह करना एक विशेष शौक है एवं ऐसे संग्रहकर्ताओं को ‘‘फिलैटेलिस्ट” कहते हैं। डाक टिकिट तीन तरह के छपते हैं साधारण डाक के लिए, सरकारी प्रयोग के लिए एवं रसीदी टिकिट। इस प्रकार डाक विभाग डाक टिकिटों के माध्यम से 165 वर्ष से लोगों की सेवा कर रहा है।

इस वीथिका में 1840 में ब्रिटेन से जारी विश्व का प्रथम डाक टिकिट से लेकर 1947 के पूर्व तक ग्रेट ब्रिटेन, जिब्राटर, माल्टा, चीन, हांगकांग, सीलोन को टिकिटों के अलावा भारत की देशी रियासतों यथा जम्मू कश्मीर, चम्बा, नाभा, सिरमौर, पटियाला, अलवर, जयपुर, झालावाड़, किशनगढ़, कोचीन, हैदराबाद के अतिरिक्त मध्यप्रदेश की रियासतों, बड़वानी, धार, इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, दतिया, ओरछा के डाक टिकिटों को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया है।

आटोग्राफ्स (हस्ताक्षर): इस दीर्घा में विभिन्न विधाओं की कई महान हस्तियों के कुछ दुर्लभ पत्रों एवं हस्ताक्षरों का प्रदर्शन किया गया है। इन महापुरूषों में धर्माचार्य, समाज सुधारक, राजनेता, इतिहासकार, साहित्यकार, कलाकार आदि सम्मिलित हैं। इनमें हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में श्याम सुंदरदास, रामचंद शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी से लेकर अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, बनारसीदास चतुर्वेदी, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, वृन्दावन लाल वर्मा आदि है। राजनैतिक क्षेत्र में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, पुरूषोत्तम दास टण्डन, पं. मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी के निज सचिव महादेव देसाई एवं प्यारेलाल आदि प्रमुख हैं। इतिहास एवं पुरातत्व विद्वान डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा, सुनीति कुमार चटर्जी, काशीप्रसाद जायसवाल, वासुदेवशरण अग्रवाल, राधाकुमुद मुकर्जी, राधाकमल मुकर्जी, लोचनाप्रसाद पांडेय, डॉ. भगतवत शरण उपाध्याय प्रमुख है। धर्म संस्कृति एवं कला क्षेत्र में अवनीन्द्रनाथ टैगोर, रामानंद चटर्जी, असीत कुमार हालदार, ललित मोहन सेन, श्रीपाद दामोदार सातवलेकर, हनुमान प्रसाद पोद्दार, आचार्य श्रीराम शर्मा, अनागरिक धर्मपाल, रामदास गौड़, डॉ. कामिल बुल्के आदि प्रमुखता से प्रदर्शित किए गए हैं। 


दुर्लभ वाद्य-यंत्र वीथीः
इस वीथिका में मयूरी इसराज (मयूरी वीणा), सुर बहार, चन्द्र सारंग, इसराज, विचित्र वीणा, सरस्वती वीणा, सारंगी, हॅसा बेला, सरोद, रबाब, सुर श्रॅगार, दिलरूबा, सितार, रूद्र वीणा, वायलिन, पखावज, सन्तूर, शहनाई, आदि वाद्य-यंत्र प्रदर्षित हैं।

 

संग्रहालय खुलने व बन्द होने का समय: प्रातः 10.30 बजे से सायः 5.30 बजे तक।

प्रत्येक सोमवार एवं शासकीय अवकाश के दिन संग्रहालय बन्द रहेगा।

प्रवेश शुल्क:


भारतीय नागरिक: रू. 10.00 प्रति व्यक्ति
(15 वर्ष तक के बच्चे निशुल्क)


विदेशी नागरिक: रू. 100.00 प्रति व्यक्ति

फोटोग्राफी शुल्क: रू. 50.00 प्रति कैमरा


वीडियोग्राफी शुल्क: रू. 200.00 प्रति कैमरा

प्लास्टर कास्ट एवं प्रकाशन विक्रय केन्द्र पर विभागीय प्रकाशन की पुस्तकें, फोल्डर, पोस्ट कार्ड एवं प्लास्टर कास्ट प्रतिकृतियां उपलब्ध है